अमित जैन (ज्योतिषाचार्य)
मय जब करवट लेता है, तो उसकी आहटें दूरगामी होती हैं। जुलाई के इस पाक्षिक खंड में हम प्रकृति और ब्रह्मांड, दोनों के स्तर पर एक युगांतरकारी संधिकाल से गुजर रहे हैं। पारंपरिक पंचांग के अनुसार, यह पक्ष आषाढ़ के समापन और श्रावण के पदार्पण का साक्षी है। मेदिनी ज्योतिष के दृष्टिकोण से देखें तो सूर्य का मिथुन से निकलकर जलतत्व की राशि कर्क में प्रवेश करना और उस पर देवगुरु बृहस्पति की शुभ दृष्टि, देश-काल के स्तर पर एक बड़े वैचारिक और आर्थिक मंथन की नींव रख रही है।
साहित्यिक और दार्शनिक धरातल पर यह अवधि केवल कैलेंडर के पन्ने पलटने जैसी नहीं है। महाकवि कालिदास ने आषाढ़ के इन्हीं दिनों में 'मेघदूतम्' की रचना कर विरह को साधना में बदला था। आज का ज्योतिषीय परिदृश्य भी हमसे इसी आंतरिक रूपांतरण की मांग करता है। इस पाक्षिक गोचर में जहाँ मंगल की ऊर्जा और शनि का अनुशासन आमने-सामने हैं, वहीं समाज में एक नई चेतना और व्यवस्थागत सुधारों की छटपटाहट दिखेगी। बाजार, राजनीति और प्रकृति में उतार-चढ़ाव इस पखवाड़े के मुख्य लक्षण हैं। ग्रहों का यह कोलाहल हमें सचेत करता है कि उतावलेपन के इस दौर में धैर्य ही सबसे बड़ा कल्पवृक्ष है। आने वाले पंद्रह दिन नीतिगत निर्णयों के लिए जितने संवेदनशील हैं, जनमानस के लिए अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को संचित करने के लिए उतने ही उर्वर हैं।
