राजेश कसेरा
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
जस्थान की सियासत में हाड़ौती क्षेत्र का दबदबा हमेशा से रहा। इस क्षेत्र ने वसुंधरा राजे को दो बार प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया तो ओम बिड़ला के रूप में लगातार दो बार लोकसभा अध्यक्ष को चुना। भाजपा के सबसे बड़े और प्रभावशाली नेता ओम बिड़ला ही हैं। बीते दो दशक में बिड़ला ने कोटा संभाग में जिस तरह से अपनी पकड़ को मजबूत बनाया, उसने क्षेत्र की सबसे कद्दावर नेता वसुंधरा राजे और उनके वर्चस्व को भी कमजोर कर दिया। वहीं कांग्रेस की बात करें तो वसुंधरा और बिड़ला के सामने शांति धारीवाल मजबूत स्तंभ के रूप में चुनौती देते रहे। अशाेक गहलाेत के तीन बार मुख्यमंत्री बनने में प्रमुख कड़ी धारीवाल बने। क्षेत्र में धारीवाल के बाद दूसरे बड़े चेहरे भाजपा से रूठकर कांग्रेस में आए प्रहलाद गुंजल बने। 2024 के लोकसभा चुनाव में बिड़ला को कड़ी चुनौती देने वाले गुंजल इस समय हाड़ौती में कांग्रेस के बड़े चेहरे हैं और विपक्ष की मजबूत आवाज बनकर बिड़ला के साथ राज्य सरकार को घेरते हैं। आने वाले समय में भी सत्ता की धुरी इन्हीं दिग्गज नेताओं के आस-पास घूमेगी। प्रदेश में ढाई साल बाद 2028 में विधानसभा चुनाव होंगे तो तीन साल बाद 2029 में लोकसभा। उस समय चुनाव की बिसात कैसे बिछेगी, इसकी तस्वीर अभी से नजर आने लगी है। फिर भी कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाबों का राज्य के साथ कोटा संभाग के आमजन को इंतजार रहेगा।
बड़ा सवाल : क्या वसुंधरा फिर से सत्ता और संगठन में निर्णायककर्ता बनेंगी?
एक समय हाड़ौती की राजनीति के सबसे बड़े चेहरे और बड़े नेता कभी वसुंधरा राजे के आशीर्वाद से ही ऊंची उड़ान भर सके। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का राजनीति में उदय 2003 में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में हुआ। विधानसभा चुनाव में बिड़ला कांग्रेस के दिग्गज शांति धारीवाल से चुनाव जीते और संसदीय सचिव बने। लेकिन समय के साथ दोनों के सबंधों में कटुता और वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा आ गई। जैसे-जैसे बिड़ला का कद दिल्ली में बढ़ता गया वैसे-वैसे राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा का प्रभाव कम होता गया। शीर्ष नेतृत्व ने भी वसुंधरा के कद और प्रभाव को घटाने के लिए हाड़ौती में बिड़ला को आगे बढ़ाया और विरोधी खेमे को सक्रिय करने में उन्होंने परदे के पीछे बड़ी भूमिका निभाई। ऊपर से मिले सहयोग और समर्थन के बाद राजस्थान में भाजपा ने सत्ता और संगठन में नए नेतृत्व को अवसर दिया। इस सोच और निर्णय ने हाड़ौती और राजस्थान की सबसे धाकड़ नेता वसुंधरा को पीछे छोड़ दिया। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद देकर राज्य संगठन से बाहर कर दिया तो भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर सत्ता से दूर। इसका असर यह हुआ कि उनके पंसदीदा सारे नेता या तो ठंड में लगा दिए गए या उन्होंने अवसर देखकर पाला बदल लिया। ऐसे में आने वाले ढाई साल और 2028 के विधानसभा चुनाव वसुंधरा के राजनीतिक वजूद के लिए निर्णायक और महत्वपूर्ण होंगे। क्योंकि राजनीति में धारा और हवा के हिसाब से कब-क्या बदल जाए, कोई अनुमान नहीं लगा सकता। इन परिस्थितियों में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को वसुंधरा को भरोसे में लेना होगा कि राजस्थान में उनकी सक्रियता और जुड़ाव से एक और एक दो नहीं बल्कि 11 होगा। वहीं भाजपा को भी फिर से सत्ता में लौटना है और केन्द्र में राजस्थान का सहयोग चाहिए तो वसुंधरा जैसी ताकतवर नेता को साथ में लेकर चलना ही होगा।
कांग्रेस की उलझन : अगले चुनाव में किसको बनाएंगे धारीवाल का उत्तराधिकारी?
हाड़ौती में कांग्रेस की सबसे बड़ी उलझन अगले चुनाव में शांति धारीवाल का बड़ा विकल्प ढूंढना होगी। उनके कद जितना कोई दूसरा बड़ा नेता कोटा संभाग में कांग्रेस को एकजुट रखने जैसा नहीं। बारां के अंता से विधायक विधायक प्रमोद जैन भाया और बूंदी जिले के हिंडौली से विधायक अशोक चांदना भी अपने-अपने क्षेत्रों तक सीमित रहे। वहीं, रामनारायण मीणा, हरिमोहन शर्मा, रविन्द्र त्यागी, क्रांति तिवारी जैसे कई नेता पूरे अंचल में प्रभाव नहीं बना पाए। क्षेत्र की 17 विधानसभा सीटों में सबसे ज्यादा छह सीटें कोटा जिले में हैं। जबकि बारां-झालावाड़ में चार-चार और बूंदी में तीन सीटें हैं। इन पर वर्तमान सियासी तस्वीर को देखें तो भाजपा के पास 11 और कांग्रेस के पास 6 सीटें हैं। जिन छह सीटों पर कांग्रेस जीतीं उनमें एक भी मौजूदा विधायक ऐसा नहीं जिसका प्रभाव सभी 17 सीटों पर हों। कांग्रेस को प्रदेश की सत्ता में लौटने के लिए हाड़ौती अंचल को मजबूत बनाना होगा। कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व धारीवाल के उत्तराधिकारी के रूप में उनके पुत्र अमित धारीवाल या बहू एकता धारीवाल को चुनाव मैदान में उतारते हैं तो वे कोटा उत्तर में तो शांति धारीवाल की साख के बूते चुनाव भी जीत जाएं, लेकिन इनके नाम या चेहरे पर हाड़ौती में कांग्रेस कोई कमाल दिखा पाए, इसकी संभावनाएं फिलहाल तो नजर नहीं आती।
दुविधा और दांव : क्या प्रहलाद गुंजल के भरोसे कांग्रेस आगे बढ़ पाएगी?
हाड़ौती में फायर ब्रांड नेता की छवि रखने वाले प्रहलाद गुंजल अपने गर्म मिजाज के चलते कभी किसी पार्टी या बड़े नेता के साथ जुड़कर नहीं रह पाए। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और ओम बिड़ला से मतभेद बढ़ने के बाद उन्होंने कोटा-बूंदी लोकसभा सीट से उनके ही खिलाफ चुनाव लड़ा और कड़ी टक्कर भी दी। बिड़ला को चुनाव में आईना दिखाने के बावजूद हाड़ौती में कांग्रेस का पूरा भरोसा गुंजल को नहीं मिल पाया। वे अभी भी कोटा में भाजपा और बिड़ला से अकेले सियासी लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि सियासत के मैदान में गुंजल और बिड़ला के बीच संग्राम नया नहीं रहा। 18 साल तक भाजपा में रहने के बाद भी दोनों के बीच संबंध अच्छे नहीं रहे। गुंजल ने वसुंधरा के खिलाफ कई बार नारे लगाए। 2008 के किरोड़ी लाल मीणा के साथ एनपीपी में शामिल हो गए। गुंजल ने हिंडौली से चुनाव लड़ा और हार गए। 2013 में पार्टी ने दाेनों के बीच सुलह कराई और गुंजल फिर से वसुंधरा के करीबी नेताओं में जुड़ गए। 2013 में उन्हें कोटा उत्तर से टिकट मिला तो उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता शांति धारीवाल को हरा दिया। राजनीति में उठा-पटक के लिए ख्यात गुंजल के दम पर कांग्रेस हाड़ौती में फिर से उठ पाएगी, यह कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
एकाधिकार का खेल : क्या बिड़ला के बिना नहीं हिलता हाड़ौती में भाजपा का पत्ता?
कोटा-बूंदी संसदीय क्षेत्र से लगातार तीन बार भाजपा के सांसद बने ओम बिड़ला की छवि कुशल संगठनकर्ता की रही। वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के 4 साल तक कोटा जिलाध्यक्ष रहे। बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष तो 6 साल तक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे। दो बार विधायक बने तो तीन बार सांसद। मौजूदा समय में यही कहा जाता है कि बिड़ला की मंजूरी के बिना भाजपा या राजनीति का एक भी पत्ता हाड़ौती में नहीं हिलता। लोकसभा अध्यक्ष जैसा मजबूत पद होने से उनका वर्चस्व केन्द्र से लेकर राज्य में बना हुआ है। बिड़ला का फिलहाल कोई तोड़ प्रदेश भाजपा या किसी और दमदार नेता के पास नहीं। सियासी दांव-पेच में माहिर हाड़ौती का यह नेता पॉलिसी मेकर और डिसाइडर के रूप में काम कर रहा है। ऐसे में भाजपा को प्रदेश और कोटा संभाग में टिके रहना है ताे बिड़ला का नाम सूची में सबसे पहले लिखना होगा, उसके बाद वसुंधरा राजे और फिर बाकी के नेताओं के नाम आएंगे।
