आज के आधुनिक युग में भविष्य की अनिश्चितता, आपसी संबंधों का तनाव और स्वास्थ्य संबंधी आशंकाएं मानव मन को लगातार अशांत कर रही हैं। ऐसे कठिन समय में अध्यात्म और भक्ति का मार्ग एक दिव्य प्रकाश की भाँति हमारा मार्गदर्शन करता है। वास्तव में, चिंता और भय कोई बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि मन की वह अवस्था हैं जो ईश्वर से आंतरिक दूरी के कारण उत्पन्न होती हैं। जब मनुष्य संसार की अनित्य और परिवर्तनशील वस्तुओं में स्थायित्व तलाशने की भूल करता है, तब निराशा और भय का जन्म होता है। इसका एकमात्र समाधान पूर्ण शरणागति और 'नाम-स्मरण' में निहित है। ईश्वर पर अटूट विश्वास मन के विकारों को शांत करता है। निरंतर नाम-जप करने से मन की नकारात्मक वृत्तियाँ शिथिल होती हैं और व्यक्ति वर्तमान क्षण में स्थिर होना सीखता है। यह आध्यात्मिक प्रक्रिया धीरे-धीरे भय का स्थान गहरी आंतरिक शांति और आत्मविश्वास में बदल देती है, जो वर्तमान तनावग्रस्त समाज के लिए नितांत आवश्यक है।
### (प्रेमानंद जी महाराज के प्रवचनों के संपादित अंश )
विकारों से मुक्ति और अटूट विश्वास
विशेष रिपोर्टर
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