कोटा में चट्टानेश्वर के पास वो शैलचित्र हैं, जिन्हें हजारों साल पहले इस इलाके में रहने वाले आदिमानव ने बनाया। ये शैलचित्र इस बात का प्रमाण हैं कि जब दुनिया के बहुत सारे हिस्सों में मानव सभ्यता ने अपने अस्तित्व को महसूस करना शुरू किया होगा, उस समय भी चंबल नदी और उसके किनारे जीवन का सौंदर्य अंगड़ाई ले रहा था। बड़ी बड़ी चट्टानों के साये में रहने वाले मनुष्य का जीवन आसान तो नहीं रहा होगा। चारों तरफ जंगल होंगे। जीवन के लिये तरह तरह की चुनौतियाँ होंगी। लेकिन चुनौतियों से नहीं घबराने का संस्कार यह मिट्टी हमेशा देती है। जिन्होंने इस इलाके के भूगोल को जाना है, वो इस इलाके के स्वभाव को भी जान सकते हैं। हाड़ौती अंचल की सबसे प्रमुख नदी चंबल मध्यप्रदेश के पास विंध्याचल पर्वत श्रेणी की जनापाव पहाड़ी से निकलती है और उत्तरप्रदेश में इटावा के पास यमुना में अपना सर्वस्व समर्पित कर देती है। इस पूरे प्रवाह क्षेत्र में चंबल अधिकांशतः दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। याने नदियों के प्रवाह की सामान्य दिशा से विपरीत दिशा में। विपरीत दिशा में बहने का यह संस्कार यहां के स्वभाव को चुनौतियों से लड़ने की अद्भुत सामर्थ्य देता है।प्रतिकूलताओं को संवार कर उन्हें अपनी उपलब्धियों में बदल देना ही तो कोटा की पहचान रही है। वरना, जो चंबल अपने बीहड़ के डाकुओं के कारण हमेशा दुर्दान्त मानी जाती रही हो, वो चंबल कोटा के समीप आकर विकास का पर्याय कैसे बन सकती थी? नदियों को हमारी संस्कृति में माँ कहा गया है। माँ जब बच्चे को प्रतिकूलताओं से जूझने में आनंद का पाठ सिखाए तो हर श्राप उस बच्चे के लिये वरदान बन जाता है। हर चुनौती उसके लिये एक नये सवेरे का उत्सव लेकर आती है। शिवाजी का उदाहरण भी तो यही कहता है। चंबल की कहानी में एक किस्सा यह भी है कि वह अभिशापित नदी है। कहते हैं कि जब भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण किया गया तो विकल द्रोपदी ने श्राप दिया था कि उस नदी का पानी कोई नहीं पिये, जिस नदी के किनारे मरे हुए जानवरों के चमड़े सूखते हों। याने चंबल नदी। किंवदती है कि पुराण प्रसिद्ध राजा रंतिदेव के यहाँ उपयोग में आने वाले जानवरों की खाल से निकलने वाले तरल से चंबल नदी की उत्पत्ति हुई। इसीलिये चंबल नदी को कालीदास ने ‘रंतिदेवस्य कीर्तिम्’ कहकर संबोधित किया है। राजा रंतिदेव की कीर्ति की वाहक बनकर नकली चंबल नदी आज अपने भव्य रिवरफ्रंट के साथ कोटा की कीर्ति की कहानी कह रही है। कोटा का जो चंद्रेसल कुछ दिनों पहले एक आपराधिक घटना के कारण सूर्खियों में रहा, उसी चंद्रेसल क्षेत्र में कभी प्रसिद्ध पुराशास्त्री डॉ. वॉकणकर को शतुरमुर्ग का वह अण्डा मिला था, जिसे पचास हजार साल पुराना आंका गया था। जीवन कहाँ से कहाँ चला आया है? रामपुरा, लाड़पुरा, बजाजखाना, घंटाघर की तंग गलियों से होते हुए हम बहुमंजिला इमारतों तक पहुँच गये हैं। फिर भी कचौरी और कड़क्यों के प्रति सारे शहर की दीवानगी एक जैसी है। कहते हैं कि चंबल का पानी चट्टानी है और इस पानी को पचाने के लिये लाल मिर्च चाहिये होती है। मिर्च याने तीखापन याने एक चुनौती। हम तूफानों की परवाह नहीं करते। हमें चुनौतियाँ लुभाती हैं। कभी कोटा स्टोन और कोटा साड़ी के लिये पहचाना जाने वाला कोटा शहर अब दुनिया भर में अपनी कोचिंग की सफलता के लिये पहचाना जाता है। कुछ समय पहले कोचिंग की कीर्ति को कुछ कलुषों ने कम करने की कोशिश की तो संवेदनशील लोग चिंतित हो उठे। लेकिन चंबल तो अपनी रवानी से बहती रही। उसे पता है कि पत्थर के जिगर वालों, ग़म में वो रवानी है/ खुद राह बना लेगा, बहता हुआ पानी है। इसीलिये जब एक शायर ने लिखा कि कई हादसात आये, कई वाक़यात गुज़रे/ रूखे जिन्दगी को अक्सर मेरे अदम ने संवारा। कोटा की उम्मीदों का आसमान अनंत है। जगजीत सिंह और श्रेया घोषाल जैसे कलाकारों के गुरू इसी शहर ने दिये हैं। हमारी एक बेटी कुछ समय पहले मिस इंडिया बनी थी तो दूसरी बेटी मुक्केबाजी के क्षेत्र में देश की सबसे ताकतवर संभावनाओं में एक गिनी जाती है। यह शायद दुनिया का ऐसा अकेला शहर है जिसके आसपास कोयला, पानी, परमाणु ऊर्जा और गैस से बड़े पैमाने पर विद्युत उत्पादन होता है। हमारे एक प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत को अपना नेतृत्व दे रहे हैं और भीमचौरी या कंसुआ जैसे स्थान युगों युगों से दुनिया को प्रेम का संदेश दे रहे हैं। हम वो हैं जो रावण को भी रावण जी कहकर पुकारते हैं लेकिन जब मिट्टी या मर्यादा के मान के लिये प्राण न्यौंछावर करने की बारी आती है तो रण से पीछे नहीं हटते। कारगिल के रणक्षेत्र में पहली आहुति कोटा के बेटे अजय आहूजा ने ही दी थी। लेकिन कोटा चंबल की ही तरह कठिन बीहड़ों से गुज़रकर भी सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय के सि़ांत के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहता है। क्या आप जानते हैं कि बीहड़ों का दुर्गम सफर तय करके चंबल जिस स्थान पर यमुना से मिलती है, उस स्थान को पचनदा कहा जाता है और उत्तरप्रदेश के इटावा के निकट स्थित पचनदा नामक स्थान संभवतः ऐसा अकेला स्थान है, जहाँ पाँच नदियों का संगम होता है। चंबल सदानीरा कही गई है। याने ऐसी नदी जिसमें हमेशा पानी बहता रहता है। चंबल के संस्कार हमारी रग रग में हैं। ईश्वर इन संस्कारों को चंबल के पानी से सदैव सींचता रहे।
हमें चंबल ने सिखाया है चुनौतियों से लड़ना
अतुल कनक
विशेष रिपोर्टर
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