नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा
एक-दो नहीं, लगातार 10 नाकामियां। हर बार उम्मीद लेकर आगे बढ़े और हर बार मंजिल कुछ कदम दूर रह गई। दसवीं असफलता के बाद लगा कि अब शायद सपना छोड़ देना चाहिए, लेकिन पिता की एक सीख ने फिर खड़ा कर दिया। कोटा के आकाश चौधरी ने 11वीं कोशिश में वह मुकाम हासिल कर लिया, जिसके लिए वे वर्षों से संघर्ष कर रहे थे। उनका भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट पद पर चयन हुआ है।
आकाश के पिता नरेंद्रचौधरी भारतीय सेना में 17 साल सेवाएं दे चुके हैं। मूल रूप से भरतपुर निवासी नरेंद्र वर्ष 2021 से कोटा सिटी पुलिस लाइन में कांस्टेबल हैं। परिवार वर्तमानमें कोटा में रहता है। आकाश के लिए अनुशासन और संघर्ष की शुरुआत बचपन में ही हो गई थी। आठवीं कक्षा से वह परिवार से दूर कर्नाटक के बेलगावी स्थित राष्ट्रीय मिलिट्रीस्कूल में पढ़े। शुरुआत में घर की याद, सख्त दिनचर्या, नियमित अभ्यास और अनुशासनउनके लिए आसान नहीं था। कई बार घर की याद में रोए भी, लेकिन धीरे-धीरे उसी माहौल ने उन्हें मजबूत बना दिया। सेना में अफसर बनने का लक्ष्य तय करने के बाद आकाश ने रोजाना 10 से 12 घंटे तक पढ़ाई की। एक के बाद एक प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली। दसवीं बार नाकामी मिलने पर उनका आत्मविश्वास भी डगमगानेलगा। इसी दौर में पिता नरेंद्रने उन्हें समझाया कि चींटी बार-बार गिरकर भी चढ़ना नहीं छोड़ती।मंजिल तक पहुंचने के लिए कोशिश जारी रखनी पड़ती है। आकाश ने इस सीख को अपना मंत्र बनाया। तैयारी दोबारा शुरू की और 11वें प्रयास में आखिर चयन हासिल कर लिया। आकाश अपनी सफलता का बड़ा श्रेय पिता के मार्गदर्शन और परिवार के त्याग को देते हैं।
पिता सिपाही रहे, बेटा बना अफसर
नरेंद्र चौधरी ने बेटे पर कभी सेना में जाने का दबाव नहीं बनाया। उनका कहना है कि हर पिता चाहता है कि बेटा उससे बड़ा मुकाम हासिल करे। खुद सेना में 17 साल सेवा देने के बाद अब बेटे को अफसर बनते देखना उनके लिए सबसे बड़ा गर्व है।
8वीं से घर से दूर, मां ने सहा बेटे से बिछोह
आकाश की मां बताती हैं कि उनका एक ही बेटा है। आठवीं कक्षा से पढ़ाई के लिए घर से दूर रहने के कारण उसकी कमी हमेशा खली। पिता अनुशासन को लेकर सख्त थे, जबकिमां बेटे के प्रति नरम रहीं। अब उसकी सफलता ने वर्षों का इंतजार और त्याग सार्थक कर दिया।
