कुछ समय पहले एक खबर ने हर संवेदनशील व्यक्ति को स्पंदित किया था। पुणे के एक व्यापारी ने लखनऊ के एक वृद्धाश्रम में दम तोड़ा और जब उसकी बेटियों को अंतिम संस्कार के लिये कहा गया तो उन्होंने आने में असमर्थता जताते हुए कहा कि वो पैसा भेज देंगी। एक बेटी का तो यह वीडियो वायरल भी हुआ, जिसमें वेा अंतिम संस्कार के समय पूछ रही है कि और कितनी देर लगेगी, हमें नहाना और खाना भी खाना है। करीब पाँच साल पहले मुंबई के पॉश इलाके लोखंडवाला की एक बहुमंजिला ईमारत में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला का बेटा लंबे समय बाद अमरीका से लौटा तो बहुत पुकारने के बाद भी फ्लैट का दरवाजा नहीं खुला। डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला गया तो अंदर बुजुर्ग महिला का कंकाल निकला अर्थात् तमाम संपन्नताओं के बावजूद उस वृद्धा की मृत्यु कई दिन पहले हो चुकी थी। बेटे ने बताया कि करीब साल भर पहले उसने जब माँ से बात की थी तो माँ स्वस्थ थी। अर्थात् पिछले करीब एक साल से बेटे को अकेली रह रही माँ से बात करने तक की फुर्सत नहीं मिली थी। संचार क्रांति के इस दौर में जबकि दुनिया के किसी भी कोने से अपने प्रियजनों से बात करना बहुत आसान हो गया है, यदि बेटा यह कहे कि उसने साल भर पहले ही माँ से बात की थी तो उस माँ की किस्मत पर तरस आता है जिसने कदाचित अपने टेलीफोन को निहारते हुए ही इस उम्मीद में हमेशा के लिये आँखें मूँद लीं कि कभी तो बेटे की पहल पर उसके टेलीफोन की घंटी बजेगी।
भारतीय संस्कृति में बुजुर्ग माता-पिता की सेवा को बहुत पुण्य का कार्य माना गया है। कहानी कहती है कि श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता की इच्छा तीर्थयात्रा की हुई तो श्रवण कुमार ने उन्हें कांवड़ में बैठा कर तीर्थ दर्शन करवाए थे। साक्षात् परमात्मा का अवतार कहे जाने वाले अयोध्या के राजकुमार रामचंद्र ने पिता की एक आज्ञा सुनकर चौदह वर्ष के लिये वनवास स्वीकार कर लिया था। गंगापुत्र भीष्म ने भी अपने पिता की एक युवती के प्रति आसक्ति के बाद पनपे प्रसंगों में पिता की इच्छा पूरी करने के लिये आजीवन ब्रह्चर्य का अखण्ड व्रत ले लिया था।हमारा प्राचीन वांग्मय माँ और मातृभूमि की महिमा को स्वर्ग के सुखों से बढ़कर बताता है और समाज है कि अपने बुजुर्गों के प्रति ही उपेक्षा भाव से भर गया है। क्या यह विसंगति नहीं है कि नौ महीने अपनी कोख में पालकर जीवन देने वाली माँ की खैरियत जानने का ख्याल बेटे के मन में साल भर तक नहीं आता ?
बुजुर्ग होना, वह समय होता है जब शरीर की सामर्थ्य चुकने लगती है लेकिन जीवन अपनी संपूर्ण प्रभा के साथ खिलखिलाता है। दुर्दम्य बीमारियों के बावजूद जीवन की यह खिलखिलाहट अपने अंत तक कायम रहती है। चूँकि प्रायः बुजुर्ग अपने व्यवसायिक या नौकरी संबंधी दायित्वों से मुक्त हो चुके होते हैं, इसलिये वो चाहते हैं कि परिजन उनके पास बैठें, उनसे बातें करें। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और एकाकीपन सबको सालता है।
हर पीढ़ी के जीवन की अपनी विवशताऐं और अपनी प्राथमिकताऐं होती हैं। कदाचित यह भी एक कारण रहा होगा कि प्राचीन काल में जीवन को जिन चार आश्रमों में विभाजित किया गया था, उनमें अंतिम आश्रम सन्यासाश्रम था जिसके लिये आवश्यक उदासीनता का उन्नयन संस्कार वानप्रस्थाश्रम में ही हो जाता है।...तो क्या अपने परिवेश के प्रति उदासीनता अपनाकर ही अंतिम समय की प्रतीक्षा ही बुजुर्गों की नीयति है? शायद नहीं, क्योंकि सन्यासाश्रम में प्रविष्ट बुजुर्गों का समाज में एक विशेष सम्मान हुआ करता था और सारा समाज उनके जीवनानुभवों का लाभ लिया करता था। आवश्यकता है कि हम बुजुर्गों के अस्तित्व को सम्मान दें और उनके अनुभवों से अपने भविष्य की दिशा निर्धारित करें। आवश्यकता यह भी है हम एक शायर के इस शेर के मूल भाव को समझें -‘‘फल नहीं देगा, न दे- छाया तो देगा मुझे/ पेड़ बूड़ा ही सही घर में लगा रहने दो।’’
