नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा
एक गांव ऐसा भी है, जिसकी पहचान कोटा जिले से है, लेकिन विधानसभा बारां की है। लोकसभा क्षेत्र बारां-झालावाड़ है तो बिजली विभाग के काम बारां जिले से होते हैं और राजस्व संबंधी कार्यों के लिए सांगोद तहसील के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह कहानी कोटा जिले के अरनिया गांव की है।
यहां के ग्रामीणों के लिए सरकारी कामकाज किसी एक प्रशासनिक व्यवस्था के तहत नहीं, बल्कि दो जिलों के बीच बंटा हुआ है। नतीजा यह है कि एक ही गांव के लोगों को अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग जिलों का रुख करना पड़ता है।
परवन नदी के किनारे बसा अरनिया गांव कोटा जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर और बारां से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। भौगोलिक रूप से बारां के अधिक नजदीक होने के बावजूद गांव कोटा जिले की खड़िया पंचायत में शामिल है। वहीं राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से यह अंता विधानसभा और बारां-झालावाड़ लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। प्रशासनिक सीमाओं और रोजमर्रा के सरकारी कामकाज के इस बंटवारे ने ग्रामीणों के सामने अलग तरह की मुश्किलें खड़ी कर रखी हैं।
जिले बदले, लेकिन उलझन नहीं बदली
अरनिया का इतिहास भी जागीरी व्यवस्था से जुड़ा रहा है। बारां जिला बनने के बाद गांव कोटा जिले की खड़िया पंचायत में शामिल कर दिया गया। इससे पहले वर्ष 2005 तक यह बारां जिले की रटावद पंचायत का हिस्सा था। वर्ष 2005 में इसे खड़िया पंचायत में शामिल किया गया और हालिया परिसीमन में नवगठित उमरदा पंचायत का हिस्सा बना दिया गया। पंचायत की सीमाएं बदलती रहीं, लेकिन ग्रामीणों की प्रशासनिक और विभागीय उलझन दूर नहीं हो सकी।
राजस्व के लिए सांगोद, बिजली के लिए बारां
ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी परेशानी सरकारी विभागों के अलग-अलग जिलों से जुड़े होने की है। राजस्व संबंधी काम के लिए उन्हें सांगोद तहसील जाना पड़ता है, जबकि बिजली विभाग से जुड़े कार्यों के लिए बारां जाना होता है। यानी एक ही गांव के लोगों को अपने काम के अनुसार अलग-अलग प्रशासनिक मुख्यालयों तक पहुंचना पड़ता है। इससे समय और संसाधन दोनों खर्च होते हैं।
स्कूल आठवीं तक, शिक्षकों की भी कमी
परवन नदी के किनारे बसे इस गांव की आजीविका का प्रमुख आधार खेती है। अधिकांश परिवार कृषि कार्य से अपना गुजर-बसर करते हैं। गांव में सरकारी सुविधा के नाम पर आठवीं कक्षा तक का विद्यालय है, लेकिन यहां भी शिक्षकों की कमी ग्रामीणों की चिंता बढ़ाती है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव की जरूरतों और सुविधाओं के लिहाज से प्रशासनिक व्यवस्था का एकरूप होना जरूरी है।
एक जिले में शामिल करने की मांग
ग्रामीणों ने अपनी समस्या जनप्रतिनिधियों के सामने भी रखी है। उनकी मांग है कि अरनिया को किसी एक जिले की प्रशासनिक व्यवस्था में पूरी तरह शामिल किया जाए, ताकि राजस्व, बिजली और अन्य सरकारी कामों के लिए अलग-अलग जिलों के चक्कर न लगाने पड़ें। इस संबंध में जनप्रतिनिधियों को अवगत कराने के बावजूद अब तक समस्या का समाधान नहीं हुआ है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब गांव की रोजमर्रा की जरूरतें एक ही प्रशासनिक व्यवस्था से पूरी होनी चाहिए तो फिर उन्हें दो जिलों के बीच क्यों भटकना पड़े?
