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व्यंग्य : पत्र एक निष्ठावान कार्यकर्ता का

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व्यंग्य : पत्र एक निष्ठावान कार्यकर्ता का
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डॉ अतुल चतुर्वेदी

स्वतंत्र लेखक, स्तंभकार एवं कवि

मननीय अध्यक्ष जी ,

सादर प्रणाम !

जैसा कि आपको विदित है कि गत चुनाव में पार्टी की जो गति हुयी है उसके लिए आपकी मति भी कुछ जिम्मेदार नहीं है। यद्यपि आप जानते हैं कि मैं सदैव पार्टी का एक निष्ठावान सिपाही रहा हूं लेकिन सिपाही होने का मतलब यह नहीं कि हम जिन्दगी भर डोली उठाते रहेंगे। आखिर हमारे भी तो कुछ अरमान हैं हम भी चार पैसे कमाने के लिए राजनीति में आए हैं। पार्टी के लिए हमने दरियां भी बिछायी हैं ,पुलिस के लट्ठ भी खाए हैं। हमारा भी बलिदान कुछ कम नहीं रहा है। लेकिन पिछले कुछ बरसों देखने में आ रहा है कि पार्टी में पैराशूटी नेताओं की बाढ़ सी आ गयी है। निष्ठा , समर्पण सब तेल लेने चले गए हैं। (कृपया बुरा न मानें ये एक लोकप्रिय फिल्मी गीत की पंक्तिया हैं ) कभी – कभी लगता है कि पार्टी की हालत एक हारे हुए जुआरी की तरह हो गयी है। जो अपने घर लौटने से कतराता है। पार्टी को पुराने एजेण्डे की ओर लौटना होगा। राम जन्म भूमि , राम सेतु जैसे मुद्दे उठाने होंगे। लगता है राम जी हम से रूठ गए हैं। बेहतर हो पार्टी को राम मार्ग पर वापिस लाया जाए , वरना पार्टी का राम नाम सत्य तो हो ही रहा है। नए मुद्दे पकड़ने से पहले दस बार सोचें। ओल्ड इज गोल्ड पर यकीन करें। सच बहुत बुरा लगता है जब पब्लिक कहती है कि मजबूत नेता तो मजबूर नेता हो गया। आपने सही कहा है कि पार्टी में पर- वक्ताओं की बाढ़ सी आ गयी है। इनके पर कतरने की नितांत जरुरत है , नहीं तो ये ऊंची उड़ानें भरने लगेगें तब इन्हें रोकना ज्यादा कठिन होगा। वक्त रहते लगाम लगाना आवश्यक है। राजनीति की मांग है।

एक और बिन्दु की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा कि मुझ पर पार्टी प्रत्याशी रामप्यारे जी के साथ सहयोग न करने का जो आरोप लग रहा है वो सरासर गलत है। मैं नामांकन के दिन से ही ज्वरग्रस्त हो गया था। जो अब जाके ठीक हो सका हूं। वरना मैं पार्टी के लिये जान लगाने वालों में से हूं। यूं अगर पार्टी मुझे टिकट देती तो आप रंगत देखते। कार्यकर्ता मधुमक्खियों की तरह घर से निकल पड़ते। लेकिन इस बार वालेण्टियर को न जाने क्या हो गया। लगता है सब ससुरे चीयर गर्ल्स के साथ चीयर फुल होने में लग गए। एक और बात की जरूरत है पार्टी में की बड़े नेता लोगों पर थोड़ा लगाम लगाइए। ये क्या कि थोड़ा सीटें कम मिल गयीं तो लगे कीचड़ उछालने। बैठ गये चिट्ठी – विट्ठी लिखने। दूसरी गंभीर बात यह है कि अभी तक बूथ लेवल कार्यकर्ता का और पर्ची बांटने वालों का पैसा नहीं आया है। इस बात पर कार्यकर्ता सख्त नाराज हैं। यदि महिने भर में पुराना पैसा नहीं आया तो वे कुछ पार्टी विरोधी कदम उठाएंगे। यूं भी अब इधर पाँच साल क्या स्कोप है। उधर जायेंगे तो ठेका , दलाली , ट्रांसफर में कुछ कमा खायेंगे। कार्यकर्ता मुझे भी बहुत फोर्स कर रहे हैं। कह रहे हैं कि आप तो हमारे एक्स यम पी हैं , आप भी चलिए थोड़ा हवा – पानी बदल जायेगा।इधर कुछ दिनों से पार्टी में मेरा भी दम सा घुट रहा है। त्रिलोकी जी को राज्यसभा में ले लिया गया और विध्वंसक जी को उप चुनाव में टिकट दिया जा रहा है। एक निष्ठावान कार्यकर्ता इस अन्याय को कदापि बर्दाश्त नहीं करेगा। वो सड़कों पर आ जाएगा और जो गाड़ी खाली देखेगा उस में चढ़ जायेगा। आप तो जानते हैं कि चलती का नाम गाड़ी है। मेरा लोकतंत्र में गहरा विश्वास है मैं इसकी दलीय आवागमन व्यवस्था का कायल हूं। कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करना मेरे लिए संभव नहीं है। गाड़ी का हार्न बज रहा है कार्यकर्ता हाथ हिला – हिला कर बुला रहे हैं। खैर छोड़िए गिले शिकवे फिर कभी। मैं चलता हूं। आप भी मंथन , चिंतन , कोसन शिविर रखिए रात में आर्केस्ट्रा वगैरह हो , दिन भर मनन , चिंतन। सोचिए गहराई से सोचिए कि पार्टी क्यों हारी यूं भी पाँच साल का वक्त सोचने को कम नहीं होता है। अच्छा राम – राम।

आपका

अवसर प्रसाद सिंह,

एक्स यम. पी.

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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