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जनसंख्या में सबसे बड़ा देश होना हमारी ताकत या चुनौती

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जनसंख्या में सबसे बड़ा देश होना हमारी ताकत या चुनौती
जनसंख्या में सबसे बड़ा देश होना हमारी ताकत या चुनौती
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भारत आज लगभग 148 करोड़ लोगों के साथ दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। यह सुनकर गर्व भी होता है और चिंता भी। सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी आबादी हमारी सबसे बड़ी ताकत है या आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती? इसका जवाब सिर्फ लोगों की संख्या में नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता में छिपा है। किसी भी देश की असली ताकत उसकी जनसंख्या नहीं, बल्कि उसके लोग होते हैं। अगर लोग पढ़े-लिखे, स्वस्थ, कुशल और काम करने वाले हैं तो बड़ी आबादी देश को तेजी से आगे ले जाती है। लेकिन अगर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की कमी हो तो यही आबादी बोझ बन जाती है।

आज भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है। देश की औसत उम्र करीब 29 साल है और लगभग 65 प्रतिशत लोग काम करने की उम्र में हैं। अर्थशास्त्री इसे डेमोग्राफिक डिविडेंड यानी जनसांख्यिकीय लाभांश कहते हैं। आसान भाषा में कहें तो यह वह दौर है जब किसी देश के पास सबसे ज्यादा काम करने वाले हाथ होते हैं। दुनिया के कई विकसित देशों के पास आज यह ताकत नहीं बची है। जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के कई देशों में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है और युवाओं की कमी हो रही है। चीन भी अब इसी समस्या का सामना कर रहा है। ऐसे समय में भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा युवा कार्यबल है। लेकिन यह मौका हमेशा नहीं रहेगा। अगर आज के युवाओं को अच्छी शिक्षा, सही स्किल और रोजगार नहीं मिला तो यही ताकत कल सबसे बड़ी परेशानी बन सकती है।

भारत सिर्फ आबादी के मामले में ही बड़ा नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े कंज्यूमर मार्केट में भी शामिल है। मोबाइल से लेकर कार, ऑनलाइन शॉपिंग, डिजिटल पेमेंट, हेल्थकेयर, एजुकेशन और एंटरटेनमेंट तक हर सेक्टर भारत को बड़े बाजार के रूप में देख रहा है। यूपीआई और डिजिटल इंडिया जैसी पहल ने देश की तस्वीर बदली है। गांवों तक इंटरनेट पहुंचा है और लाखों लोग डिजिटल दुनिया से जुड़े हैं। स्टार्टअप कल्चर ने भी युवाओं को नए सपने दिए हैं। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत में निवेश करना चाहती हैं।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। हर साल लाखों युवा नौकरी की तलाश में निकलते हैं, जबकि कंपनियां कहती हैं कि उन्हें योग्य कर्मचारी नहीं मिल रहे। यानी समस्या सिर्फ नौकरी की कमी नहीं है, बल्कि सही स्किल की भी है। कॉलेज से डिग्री लेकर निकलने वाले बहुत से युवाओं के पास वह हुनर नहीं होता जिसकी इंडस्ट्री को जरूरत है। यही गैप भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में नई शिक्षा नीति, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और आयुष्मान भारत जैसी कई योजनाएं शुरू की हैं। इनसे बदलाव जरूर आया है, लेकिन अभी लंबा सफर बाकी है। नई शिक्षा नीति बच्चों को सिर्फ किताबों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें हुनर सिखाने की बात करती है। स्किल इंडिया युवाओं को रोजगार के लायक बनाने की कोशिश कर रहा है। मेक इन इंडिया का मकसद देश में ज्यादा फैक्ट्रियां लगाना और रोजगार बढ़ाना है। लेकिन इन योजनाओं की असली सफलता तभी होगी, जब इनका फायदा गांवों, छोटे शहरों और आम युवाओं तक पूरी ताकत के साथ पहुंचे।

इतनी बड़ी आबादी वाले देश में स्वास्थ्य व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। आयुष्मान भारत जैसी योजना ने लाखों परिवारों को इलाज का सहारा दिया है, लेकिन आज भी गांवों में डॉक्टरों की कमी, अस्पतालों की कमी, कुपोषण और मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। इसके साथ ही महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना भी बेहद जरूरी है। अगर देश की आधी आबादी शिक्षा, रोजगार, बिजनेस और नेतृत्व में बराबरी से आगे बढ़ेगी, तभी भारत अपनी पूरी क्षमता हासिल कर पाएगा।

अब एक नई चुनौती सामने है-आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। आने वाले वर्षों में कई पुराने काम मशीनें करने लगेंगी। डेटा एंट्री, सामान्य लेखन और कई ऑफिस के काम तेजी से बदल रहे हैं। दूसरी तरफ डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, साइबर सिक्योरिटी, रोबोटिक्स और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे नए क्षेत्रों में अवसर भी बढ़ रहे हैं। यानी अब सिर्फ डिग्री काफी नहीं होगी। जो लोग लगातार सीखेंगे और खुद को बदलते समय के साथ अपडेट रखेंगे, वही आगे बढ़ेंगे।

बढ़ती आबादी का असर सिर्फ रोजगार पर नहीं, बल्कि पानी, जमीन, मकान, ट्रैफिक, प्रदूषण और कचरे जैसी समस्याओं पर भी साफ दिखाई देता है। जलवायु परिवर्तन ने इन चुनौतियों को और गंभीर बना दिया है। इसलिए विकास का मतलब सिर्फ बड़ी इमारतें या चौड़ी सड़कें नहीं, बल्कि ऐसा विकास है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संसाधन बचाकर रखे।

भारत के सामने आज इतिहास का एक बड़ा मौका है। अर्थशास्त्री कहते हैं कि डेमोग्राफिक डिविडेंड का अवसर किसी भी देश को सिर्फ एक बार मिलता है। अगले 20–25 साल तय करेंगे कि भारत विकसित देशों की कतार में खड़ा होगा या फिर बेरोजगारी और संसाधनों के दबाव से जूझता रहेगा। ऐसा न हो इसके लिए हमें शिक्षा, स्किल, स्वास्थ्य, रोजगार, महिलाओं की भागीदारी, मैन्युफैक्चरिंग और नई टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम करना होगा।

आखिर में सवाल वही है जिससे शुरुआत हुई थी-क्या 148 करोड़ की आबादी हमारी ताकत है या चुनौती? जवाब सीधा है। आबादी कभी समस्या नहीं होती, समस्या तब होती है जब लोगों की क्षमता का सही इस्तेमाल नहीं हो पाता। अगर हर युवा को अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, सही स्किल और सम्मानजनक रोजगार मिला, तो यही 148 करोड़ लोग भारत को दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बना सकते हैं। लेकिन अगर हम यह मौका गंवा बैठे, तो यही आबादी आने वाले समय में हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकती है।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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