ADVERTISEMENT
ब्रेकिंग न्यूज़
• हाड़ौती अंचल: कोटा में नए रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट के लिए 120 करोड़ का अतिरिक्त बजट स्वीकृत • चुनाव आयोग ने आगामी निकाय चुनाव हेतु वोटर लिस्ट अपडेशन की समय सीमा बढ़ाई • राजस्थान बोर्ड परीक्षा 2026 की समय सारिणी घोषित, शिक्षा विभाग की बड़ी तैयारी • टी20 वर्ल्ड कप: भारतीय टीम ने दूसरे मुकाबले में भी दर्ज की धमाकेदार जीत
नागरिक अभिव्यक्ति
होम / शहर / लेख विस्तार
शहर

बूंदी में मिलेट्स की खेती को बढ़ावा देने की पहल, किसानों को बाजरा-ज्वार के फायदे बताए

ब्रिक्स सतत जीवनशैली सप्ताह के तहत कृषि विभाग ने आयोजित की कृषक गोष्ठियां, कम पानी और कम लागत में खेती के विकल्प अपनाने पर जोर

संवाददाता
विशेष संवाददाता विशेष रिपोर्टर
अक्षर आकार:
बूंदी में मिलेट्स की खेती को बढ़ावा देने की पहल, किसानों को बाजरा-ज्वार के फायदे बताए
बूंदी में मिलेट्स की खेती को बढ़ावा देने की पहल, किसानों को बाजरा-ज्वार के फायदे बताए
ADVERTISEMENT
खबर शेयर करें:

बूंदी, 5 नवंबर। ब्रिक्स सतत जीवनशैली सप्ताह के तहत कृषि विभाग बूंदी की ओर से किसानों को श्री अन्न एवं मोटे अनाज की खेती के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इसके तहत बुधवार को जिले के कृषि पर्यवेक्षक मुख्यालयों और ब्लॉक मुख्यालयों पर कृषक गोष्ठियों का आयोजन किया गया। इनमें किसानों को बाजरा, ज्वार सहित अन्य मोटे अनाजों की खेती के फायदे बताते हुए पारंपरिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।

कृषि विभाग की ओर से सप्ताह के निर्धारित कार्यक्रम 'सतत खाद्य प्रणालियां अपनाएं' के तहत मिलेट्स संवर्धन को प्राथमिकता दी जा रही है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक फसलों को बढ़ावा देने के साथ कृषि जैव विविधता का संरक्षण, स्थानीय खाद्य प्रणालियों को मजबूत करना और किसानों को जलवायु अनुकूल खेती के विकल्पों से जोड़ना है।

कृषि विभाग के अनुसार बाजरा और ज्वार जैसी फसलें राजस्थान की जलवायु के अनुकूल हैं। इनकी खेती में अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता होती है और कम उर्वरता वाली भूमि में भी इनका उत्पादन किया जा सकता है। इन फसलों में कीट एवं बीमारियों का प्रकोप भी तुलनात्मक रूप से कम रहता है। ऐसे में कम वर्षा और सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए ये बेहतर विकल्प साबित हो सकती हैं।

पोषण के साथ पशुपालन में भी उपयोगी

मोटे अनाज पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ खेती और पशुपालन दोनों के लिए उपयोगी हैं। बाजरा एवं ज्वार की फसल से मिलने वाला चारा पशुओं के लिए काम आता है। इससे खेती के साथ पशुपालन करने वाले किसानों को भी लाभ मिल सकता है। वहीं, इन फसलों की कम जल आवश्यकता से पानी की बचत और जल संसाधनों के संरक्षण में मदद मिलती है।

विभाग का मानना है कि मोटे अनाज का उत्पादन और उपयोग बढ़ने से स्थानीय खाद्य प्रणालियों को मजबूती मिलेगी। साथ ही फसल विविधीकरण और स्थानीय कृषि संसाधनों के बेहतर उपयोग से टिकाऊ कृषि व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।

कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे अपनी भूमि, स्थानीय जलवायु और उपलब्ध सिंचाई संसाधनों के अनुसार बाजरा, ज्वार सहित अन्य मोटे अनाजों की खेती को अपनाएं। उपयुक्त किस्मों, बुवाई के समय और फसल प्रबंधन की जानकारी के लिए किसान अपने क्षेत्र के कृषि पर्यवेक्षक एवं कृषि अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं।

ADVERTISEMENT
लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

comment पाठकों की प्रतिक्रिया (Comments)

अपनी राय दर्ज करें: