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बाल मजदूरों के पुनर्वास में लापरवाही नहीं, कानूनी प्रक्रिया से ही मिलेगा न्याय

14 साल तक के बच्चों को स्कूल और 14 से 18 वर्ष के किशोरों को कौशल विकास से जोड़ने पर जोर

संवाददाता
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बाल मजदूरों के पुनर्वास में लापरवाही नहीं, कानूनी प्रक्रिया से ही मिलेगा न्याय
बाल मजदूरों के पुनर्वास में लापरवाही नहीं, कानूनी प्रक्रिया से ही मिलेगा न्याय
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नागरिक अभिव्यक्ति @ बूंदी

बाल एवं बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें शिक्षा, रोजगारपरक कौशल और सरकारी योजनाओं से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाना भी जरूरी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के बाल श्रम और बंधुआ श्रम मामलों के विशेष मॉनिटर धनंजय टिंगल ने बुधवार को बूंदी में कहा कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना पीड़ितों का वास्तविक पुनर्वास संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों के बचाव से लेकर उनके पुनर्वास तक कई विभागों की जिम्मेदारी होती है, इसलिए सभी को समन्वय के साथ काम करना होगा।

टिंगल होटल अनंता में बाल एवं बंधुआ श्रम की रोकथाम के लिए आयोजित जिला स्तरीय कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बाल श्रम से मुक्त हुआ कोई बच्चा पढ़-लिखकर शिक्षक या डॉक्टर बनता है, तो यह सबसे बड़े गर्व की बात है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि बचाव अभियान सही तरीके से चलाया जाए और कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जाएं। उन्होंने बताया कि कई बार बंधुआ मजदूरों को परिवार सहित मुक्त कराने के बाद सीधे गांव भेज दिया जाता है। कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण ऐसे मामलों में पीड़ितों का प्रभावी पुनर्वास नहीं हो पाता।

उन्होंने बच्चों के पुनर्वास के लिए स्कूल, स्किल और स्कीम यानी शिक्षा, कौशल विकास और सरकारी योजनाओं को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए। 14 वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों को स्कूल से जोड़ने तथा 14 से 18 वर्ष के किशोरों को कौशल विकास पाठ्यक्रमों से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया। साथ ही पीड़ित बच्चों के परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि इन तीनों स्तरों पर प्रभावी काम करके बाल श्रम और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों पर अंकुश लगाया जा सकता है।

कार्यशाला में टिंगल ने कहा कि बच्चों से जुड़े कानूनों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है। एक बच्चे को बचाने से लेकर उसके संपूर्ण पुनर्वास तक नौ से 11 विभागों की भूमिका रहती है। इसमें गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) और सिविल सोसाइटी की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सभी एनजीओ को जिला प्रशासन के साथ समन्वय बनाकर काम करने के निर्देश दिए।

जिला कलक्टर हरफूल सिंह यादव ने बाल श्रम जैसी कुप्रथाओं को समाप्त करने पर जोर देते हुए डाबी और खदान क्षेत्रों में काम कर रही संस्था एक्शनएड के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि खदान क्षेत्रों में कई बच्चे अनजाने में अपने माता-पिता के साथ काम करने लगते हैं, जिससे उनकी शिक्षा और बचपन प्रभावित होता है। कलक्टर ने बाल श्रम के मामलों के समाधान के लिए एक्शन प्लान कैलेंडर तैयार करने के निर्देश दिए। इसके तहत 'बालिका शक्ति मंच' के माध्यम से हर महीने मेगा इवेंट आयोजित कर महिलाओं और बच्चों के उत्पीड़न, बाल श्रम तथा बंधुआ मजदूरी के खिलाफ जागरूकता बढ़ाई जाएगी। उन्होंने विश्वास जताया कि लगातार प्रयासों से आने वाले वर्षों में इन समस्याओं को समाज से समाप्त करने में मदद मिलेगी।

कार्यशाला में जिला पुलिस अधीक्षक अवनीश कुमार शर्मा, इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के राष्ट्रीय समन्वयक नरसिम्हन गदिराजू, एनएचआरसी के स्टेट कोऑर्डिनेटर दीप बनर्जी, बाल अधिकार विशेषज्ञ डॉ. विक्रम श्रीवास्तव, एक्शनएड एसोसिएशन की क्षेत्रीय प्रबंधक सियोन कोंगारी, बाल संरक्षण समिति अध्यक्ष सीमा पोद्दार तथा बाल अधिकारिता एवं जिला बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक रामराज मीणा सहित संबंधित विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।

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नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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