ADVERTISEMENT
ब्रेकिंग न्यूज़
• हाड़ौती अंचल: कोटा में नए रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट के लिए 120 करोड़ का अतिरिक्त बजट स्वीकृत • चुनाव आयोग ने आगामी निकाय चुनाव हेतु वोटर लिस्ट अपडेशन की समय सीमा बढ़ाई • राजस्थान बोर्ड परीक्षा 2026 की समय सारिणी घोषित, शिक्षा विभाग की बड़ी तैयारी • टी20 वर्ल्ड कप: भारतीय टीम ने दूसरे मुकाबले में भी दर्ज की धमाकेदार जीत
नागरिक अभिव्यक्ति
होम / शहर / लेख विस्तार
शहर

जनजातीय परंपराओं में बसती है प्रकृति संरक्षण की संस्कृति, पर्यावरण संतुलन का दिया संदेश

राजकीय महाविद्यालय बूंदी में कार्यशाला आयोजित, जैव-विविधता, जलस्रोतों और वन्यजीव संरक्षण में जनजातीय समुदायों की भूमिका पर हुई चर्चा

संवाददाता
विशेष संवाददाता विशेष रिपोर्टर
अक्षर आकार:
जनजातीय परंपराओं में बसती है प्रकृति संरक्षण की संस्कृति, पर्यावरण संतुलन का दिया संदेश
जनजातीय परंपराओं में बसती है प्रकृति संरक्षण की संस्कृति, पर्यावरण संतुलन का दिया संदेश
ADVERTISEMENT
खबर शेयर करें:

बूंदी, 2 नवंबर। राजकीय महाविद्यालय बूंदी में सोमवार को जनजातीय गौरव दिवस पखवाड़े के अंतर्गत ‘पर्यावरण संरक्षण में जनजातीय समुदायों का योगदान’ विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला के मुख्य वक्ता राजकीय महाविद्यालय तालेड़ा के प्राचार्य डॉ. ओमप्रकाश शर्मा रहे। उन्होंने भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपराओं का उल्लेख करते हुए प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण संतुलन में जनजातीय समुदायों की भूमिका पर प्रकाश डाला।

डॉ. शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग और पूजनीय सत्ता माना गया है। प्रकृति, पंचतत्त्वों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की यह दृष्टि भारतीय जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। उन्होंने विभिन्न राज्यों में निवासरत जनजातीय समुदायों की प्रकृति के प्रति आत्मीयता, पारंपरिक ज्ञान और संरक्षण आधारित जीवनशैली के उदाहरण प्रस्तुत किए।

उन्होंने बताया कि जनजातीय समाज सदियों से स्थानीय जैव-विविधता, औषधीय वनस्पतियों, जलस्रोतों, वन संपदा और वन्यजीवों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। पर्यावरण संरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति में संवेदनशीलता, उत्तरदायित्वबोध और सांस्कृतिक चेतना विकसित करना आवश्यक है।

जनजातीय जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण पर रखे विचार

कार्यशाला में डॉ. पूजा सक्सेना ने जनजातीय समुदायों की विशिष्टताओं पर विचार रखते हुए कहा कि उनकी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने के साथ शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक विकास भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। डॉ. पुनर्दत्त मीणा ने वन्यजीव संरक्षण में जनजातीय समुदायों के योगदान को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि सरकारी प्रयासों के साथ जनसमुदाय की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है

डॉ. दिलीप कुमार राठौड़ ने जोहड़, बावड़ी और तालाब जैसी पारंपरिक जल संरक्षण पद्धतियों की जानकारी देते हुए पारंपरिक जल प्रबंधन के महत्व को समझाया।

प्रकृति से घनिष्ठ संबंध और समन्वय जनजातीय समुदायों की विशेषता

डॉ. आशीष कुमार श्रृंगी ने विभिन्न जनजातीय समुदायों द्वारा निर्मित चित्रों का प्रदर्शन किया। इन चित्रों के माध्यम से प्रकृति के साथ जनजातीय समाज के संबंध और समन्वय को प्रस्तुत किया गया। डॉ. हिमा गुप्ता ने भारतीय सनातन परंपराओं का उल्लेख करते हुए पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता बताई। डॉ. सुनीता राठौड़ ने वन संरक्षण में जनजातीय समुदायों के ऐतिहासिक योगदान पर विचार रखे। वहीं, महेश शर्मा ने भी पर्यावरण संरक्षण में जनजातीय समाज की भूमिका पर अपने विचार साझा किए।

प्रकृति संरक्षण पूरे मानव समाज का दायित्व : राहुल सक्सेना

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य राहुल सक्सेना ने भारतीय सनातन संस्कृति और प्रकृति के पारस्परिक समन्वय पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और उसका संरक्षण भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रकृति संरक्षण केवल जनजातीय समुदायों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव समाज का दायित्व है।

कार्यक्रम का संचालन कार्यशाला संयोजक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संजय भल्ला ने प्रस्तुत किया। कार्यशाला में महाविद्यालय के संकाय सदस्यों ने सहभागिता की।

ADVERTISEMENT
लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

comment पाठकों की प्रतिक्रिया (Comments)

अपनी राय दर्ज करें: