नागरिक अभिव्यक्ति । बूंदी
बूंदी कोतवाली में दर्ज सात साल पुराने चर्चित जमीन धोखाधड़ी मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपियों को झटका दिया है। अनुसूचित जाति की महिला की पहचान का कथित रूप से दुरुपयोग कर जमीन खरीदने और बाद में बेचने से जुड़े इस मामले में हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। साथ ही आरोपियों को गिरफ्तारी से मिली रोक भी हटा दी। पांच अक्टूबर 2026 को न्यायाधीश अशोक कुमार जैन ने इस मामले में निर्णय सुनाया। पुलिस की ओर से हाईकोर्ट में प्रस्तुत तथ्यात्मक रिपोर्ट में आढ़तिया मदनगोपाल शर्मा सहित चार आरोपियों की भूमिका का उल्लेख किया गया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद बाकलीवाल के अनुसार, बूंदी कोतवाली में वर्ष 2019 में ज्योति शर्मा, परविंदर सिंह, मदनगोपाल शर्मा और सतनाम सिंह के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेज तैयार करने, उनके इस्तेमाल और आपराधिक षड्यंत्र सहित विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई थी। मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 और 120बी तथा एससी-एसटी अधिनियम की धाराएं शामिल हैं।
पुलिस की तथ्यात्मक रिपोर्ट में पहचान पत्र के कथित दुरुपयोग का पूरा घटनाक्रम बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, ज्योति शर्मा ने अपनी पहचान छिपाकर अनुसूचित जाति की महिला दर्शना देवी पुत्री पुरुषोत्तम, निवासी माटून्दा, जिला बूंदी के नाम से पहचान प्रस्तुत की। आरोप है कि इस पहचान के आधार पर 13 जनवरी 2012 को ग्राम चापरस में अनुसूचित जाति के रमेश, मन्नी, तीजू और गोप्या मेघवाल की संयुक्त खातेदारी वाली कृषि भूमि खरीदी गई। यह भूमि खसरा संख्या 251/31, रकबा तीन बीघा पांच बिस्वा बताई गई है।
रिपोर्ट में पहचान के लिए भारत निर्वाचन आयोग के मतदाता पहचान पत्र संख्या 0511857 का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस लेनदेन में परविंदर सिंह उर्फ बंटी सरदार और ओंकार की ओर से पहचान की गई थी। इसके बाद चार मई 2016 को संबंधित भूमि के संबंध में सतनाम सिंह को मुख्तारआम नियुक्त किए जाने का उल्लेख है। इस दस्तावेज में परविंदर सिंह और मदनगोपाल शर्मा गवाह बताए गए हैं। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, ज्योति शर्मा, मदनगोपाल शर्मा के भाई प्रेमनाथ की पत्नी हैं। आगे इसी जमीन को मुख्तारआम के माध्यम से केसरीलाल मेघवाल, निवासी प्रताप कॉलोनी, तालेड़ा को बेचने का आरोप है।
पुलिस ने एक फरवरी 2026 को हाईकोर्ट में तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसमें कहा गया कि आरोपियों ने कथित तौर पर मिलीभगत कर ज्योति शर्मा की वास्तविक मतदाता पहचान के प्रतिरूप का इस्तेमाल करते हुए दर्शना देवी के नाम से कूटरचित पहचान पत्र तैयार किया और उसके आधार पर जमीन का लेनदेन किया। पुलिस रिपोर्ट में आरोपियों के कृत्य को धोखाधड़ी, जालसाजी, कूटरचित दस्तावेजों के इस्तेमाल और आपराधिक षड्यंत्र से जुड़ा बताया गया है।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में उल्लेख किया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच की और दस्तावेज एकत्रित किए हैं। ऐसे में पुलिस को दर्ज मामले में कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है। इसी आधार पर अदालत ने एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज कर दी और गिरफ्तारी से मिली रोक हटा दी। मामले में आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष होना अभी अलग प्रक्रिया का विषय है।
