बूंदी। राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित ऐतिहासिक रक्तदन्तिका माता मंदिर श्रद्धा, आस्था और प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र है। जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-52 पर सथूर गांव में चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित यह शक्तिपीठ दुर्गा सप्तशती में वर्णित देवी महात्म्य से जुड़ा माना जाता है।
महानवमी के अवसर पर इस मंदिर का धार्मिक महत्व विशेष रूप से बढ़ जाता है। नवरात्र के दौरान यहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रक्तदन्तिका देवी ने वैप्रचिती नामक असुर और उसके सहयोगियों का संहार कर संसार को उनके आतंक से मुक्त कराया था। असुरों का वध करने और उनके रक्तपान के कारण देवी का नाम रक्तदन्तिका पड़ा। श्री दुर्गा सप्तशती के अंत में वर्णित मूर्ति रहस्य में देवी के स्वरूप का उल्लेख मिलता है। इसमें माता को रक्तवर्णी और चतुर्भुजी बताया गया है।
दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में भी देवी के भावी अवतारों और असुरों के संहार का वर्णन है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, वैप्रचिती के असुर पुत्रों का वध करने के बाद देवी के दांत रक्तवर्ण के हो जाएंगे और देवता व मनुष्य उनकी स्तुति रक्तदन्तिका नाम से करेंगे।
तीन बार आबाद हुआ और उजड़ा सथूर गांव
रक्तदन्तिका माता मंदिर का इतिहास सथूर गांव की प्राचीन बसावट से भी जुड़ा है। दुर्गा सप्तशती की कथा के अनुसार, राजा सुरथ ने यहां सूरथपुरी नगरी बसाई थी, जिसका नाम कालांतर में बदलकर सथूर हो गया। स्थानीय ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, यह गांव तीन बार आबाद हुआ और उजड़ा। अंतिम बार संवत 1241 में गांव के बसने का उल्लेख मिलता है।
खुदाई में मिले पुराने परकोटे की भरी हुई नींव को गांव की प्राचीन बसावट का प्रमाण माना जाता है। क्षेत्र में पुराने मकानों, हवेलियों और अन्य ऐतिहासिक अवशेषों के निशान आज भी मौजूद हैं। यहां महाभारत काल से संबंधित माने जाने वाले प्राचीन स्मारकों का भी उल्लेख मिलता है।
पूर्वाभिमुख बालुका प्रतिमा में विराजित हैं माता
सथूर गांव में मजबूत परकोटे से घिरे विशाल मंदिर में रक्तदन्तिका माता की पूर्वाभिमुख बालुका प्रतिमा स्थापित है। माता कमल पुष्प पर पद्मासन में चतुर्भुजी स्वरूप में विराजित हैं। प्रतिमा के दोनों ओर सिंहमुख के समान आकृति वाले सिंहासन हैं। माता के ऊपरी हाथों में त्रिशूल और घंटा हैं, जबकि नीचे के एक हाथ में माला और दूसरा हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में दर्शाया गया है।
चांदी की छतरी से सुसज्जित माता की प्रतिमा पर यज्ञोपवीत भी धारण कराया गया है। मंदिर की स्थापना से संबंधित कोई शिलालेख उपलब्ध नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक विवरणों में इसका अस्तित्व करीब 446 वर्ष पहले का बताया गया है।
बूंदी रियासत के इतिहास से जुड़ी एक घटना के अनुसार, बूंदी नरेश राव सुर्जन के पुत्र दूदा का मंदिर में पूजा-अर्चना के दौरान अकबर के सेनापति रणमस्त खां के साथ संघर्ष हुआ था। मंदिर में पहले बकरे की बलि देने की परंपरा थी, जिसे महाराव राजा रामसिंह के राज्यादेश से वर्ष 1865 में बंद कर दिया गया।
मंदिर में स्थापित चांदी की छतरी महाराव राजा रामसिंह की महारानी चंद्रभान कुँवरी ने संवत 1920 में आश्विन शुक्ल अष्टमी को भेंट की थी। मंदिर के पास स्थित दुर्गाविलास बाग में महारानी चंद्रभान कुँवरी का स्मारक भी है।
उनका स्वर्गवास संवत 1942 में इसी स्थान पर हुआ था।
राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने की थी मां की आराधना
दुर्गा सप्तशती में वर्णित कथा के अनुसार, चैत्र वंश में जन्मे राजा सुरथ युद्ध में पराजित होने और मंत्रियों के विश्वासघात से दुखी होकर मेधा मुनि के आश्रम पहुंचे थे। उसी समय पत्नी और पुत्रों से पीड़ित समाधि नामक वैश्य भी आश्रम में आया। दोनों ने मेधा मुनि से अपनी समस्याओं के समाधान का उपाय पूछा।
मेधा मुनि ने उन्हें चंद्रभागा नदी के तट पर बांसों से घिरे क्षेत्र में जगदंबा की आराधना करने का मार्ग बताया। इसके बाद राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने नदी किनारे बालुका प्रतिमा बनाकर तपस्या शुरू की। दोनों ने संयमपूर्वक देवी की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां चंडिका ने दर्शन दिए और राजा सुरथ को पुनः राज्य प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, चंद्रभागा नदी के किनारे राजा सुरथ द्वारा स्थापित की गई वही बालुका प्रतिमा रक्तदन्तिका माता के रूप में पूजित है।
कंजर समाज में विशेष मान्यता, नवरात्र में लगता है मेला
रक्तदन्तिका माता मंदिर के प्रति कंजर समाज में विशेष आस्था है। यहां आयोजित होने वाले वार्षिक मेले में इस समाज के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। हालांकि वर्षभर श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन चैत्र और आश्विन नवरात्र के दौरान यहां पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है।
स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ देश के विभिन्न हिस्सों और विदेश से भी भक्त माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक आस्था, प्राचीन स्थापत्य और बूंदी रियासत के इतिहास से जुड़ा यह मंदिर जिले की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
