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बूंदी के जंगल प्रशासनिक बंटवारे में उलझे, रामगढ़-विषधारी का टाइगर कॉरिडोर प्रभावित

कोर-बफर जोन के निर्धारण और दोहरे प्रबंधन पर उठे सवाल, बाघिन की मौजूदगी वाले जंगल भी टाइगर रिजर्व से बाहर

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बूंदी के जंगल प्रशासनिक बंटवारे में उलझे, रामगढ़-विषधारी का टाइगर कॉरिडोर प्रभावित
बूंदी के जंगल प्रशासनिक बंटवारे में उलझे, रामगढ़-विषधारी का टाइगर कॉरिडोर प्रभावित
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बूंदी। 2 से 8 अक्टूबर तक मनाए जा रहे वन्यजीव सप्ताह-2026 की थीम ‘जुड़े हुए आवास-समृद्ध वन्यजीव’ है। यह थीम बूंदी के जंगलों की मौजूदा स्थिति के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां भौगोलिक रूप से जुड़े वन क्षेत्र अलग-अलग प्रशासनिक नियंत्रण और प्रबंधन व्यवस्थाओं में बंटे हुए हैं। विशेषज्ञों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि इससे रामगढ़-विषधारी टाइगर रिजर्व के संभावित टाइगर कॉरिडोर और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास के समग्र प्रबंधन पर असर पड़ रहा है।

16 मई 2022 को गजट नोटिफिकेशन जारी होने के बाद रामगढ़-विषधारी को टाइगर रिजर्व घोषित किया गया और इसके जंगलों को कोर एवं बफर जोन में विभाजित किया गया। टाइगर रिजर्व करीब 1501.89 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें लगभग 481.9 वर्ग किलोमीटर कोर और 1019.98 वर्ग किलोमीटर बफर क्षेत्र है। भौगोलिक रूप से यह रणथंभौर और मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के बीच महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। हालांकि अलग-अलग प्रशासनिक नियंत्रणों के कारण इसके समग्र संरक्षण प्रबंधन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

चंबल घड़ियाल अभयारण्य वाला कोर क्षेत्र बना चुनौती

रामगढ़-विषधारी टाइगर रिजर्व के बड़े हिस्से का प्रबंधन अलग-अलग व्यवस्थाओं में होने को इसकी प्रमुख चुनौतियों में गिना जा रहा है। एक ओर रामगढ़ सेंचुरी का मुख्य वन क्षेत्र कोर-1 के रूप में है, जहां बाघ संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। दूसरी ओर चंबल क्षेत्र को कोर-2 में शामिल किया गया है।

चंबल क्षेत्र का यह कोर हिस्सा काफी हद तक राजस्व भूमि और मानवीय गतिविधियों वाले इलाके में आता है।

इस क्षेत्र को कोर का दर्जा दिए जाने के बावजूद इसके आसपास बफर क्षेत्र नहीं होने को प्रबंधन की एक प्रमुख विसंगति बताया जा रहा है।

रणथंभौर का बफर, प्रशासनिक नियंत्रण रामगढ़ का

चंबल घड़ियाल क्षेत्र वाले कोर और रामगढ़ सेंचुरी के कोर क्षेत्र के बीच इंद्रगढ़-तलवास से जैतपुर तक का महत्वपूर्ण वन क्षेत्र बूंदी जिले में है, लेकिन इसे रामगढ़-विषधारी टाइगर रिजर्व में शामिल नहीं किया गया है।

हालांकि इसका प्रशासनिक नियंत्रण रामगढ़ प्रबंधन के पास है।

वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों के अनुसार दोनों कोर क्षेत्रों के बीच करीब 50 किलोमीटर के हिस्से में रामगढ़-विषधारी का बफर क्षेत्र नहीं होना वन्यजीवों के आवागमन और कॉरिडोर प्रबंधन के लिहाज से चुनौती है।

बाघिन की मौजूदगी वाले जंगल टाइगर रिजर्व से बाहर

कोर-1 से भीमलत तक का वन क्षेत्र बाघों की आवाजाही की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। पिछले दो वर्षों से इस क्षेत्र में बाघिन की मौजूदगी की बात सामने आती रही है। इसके बावजूद यह क्षेत्र टाइगर रिजर्व के कोर प्रबंधन से बाहर टेरिटोरियल डीएफओ के अधीन है।

यहां टाइगर रिजर्व के लिए बनाए गए बसोली रेंज कार्यालय में अभी तक पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति नहीं होने की बात भी सामने आई है। वन्यजीव गतिविधियां बढ़ने के बावजूद इस क्षेत्र में टाइगर रिजर्व स्तर की संरक्षण प्राथमिकता और बजट उपलब्ध नहीं होने को भविष्य की चुनौती माना जा रहा है।

भीलवाड़ा के जंगल कोर में, डाबी-कालंदा क्षेत्र अलग

टाइगर रिजर्व के दोहरे नियंत्रण का असर बूंदी से भीमलत तक के वन क्षेत्र के विकास पर भी पड़ने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर भीलवाड़ा जिले के भोपतपुरा क्षेत्र में कोर प्रबंधन का नियंत्रण होने से विकास कार्य हुए हैं, जबकि इससे जुड़े गरड़दा-डाबी क्षेत्र को टेरिटोरियल डीएफओ के अधीन रखा गया है।

वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के कारण पूरे क्षेत्र को एक इकाई के रूप में विकसित करने में दिक्कत आ रही है। ऐसे में 1501 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला टाइगर रिजर्व होने के बावजूद संरक्षण और विकास का लाभ पूरे क्षेत्र में समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है।

एकल प्रबंधन से मजबूत होगा संरक्षण

रामगढ़-विषधारी टाइगर रिजर्व की कोर-बफर निर्धारण समिति के सदस्य पृथ्वी सिंह राजावत के अनुसार, जंगल भौगोलिक रूप से पहले से जुड़े हुए हैं और उनके संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए भी एकल व्यवस्था की जरूरत है। उनका कहना है कि आवश्यकता होने पर टाइगर रिजर्व में दो डीएफओ की व्यवस्था की जा सकती है। इससे अलग-अलग क्षेत्रों के प्रबंधन में बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकेगा और टाइगर रिजर्व को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

5 अक्टूबर को होगी अधिकारियों की बैठक

रामगढ़-विषधारी टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर सुगनाराम जाट ने बताया कि कोर एवं बफर निर्धारण में रही विसंगतियों को दूर करने के लिए 5 अक्टूबर को कोटा में संभाग स्तर की बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें रामगढ़-विषधारी टाइगर रिजर्व के कोर और टेरिटोरियल प्रबंधन से जुड़े अधिकारी शामिल होंगे। बैठक में सामने आ रही समस्याओं पर चर्चा कर समाधान का प्रयास किया जाएगा।

वन्यजीव सप्ताह के दौरान ‘जुड़े हुए आवास’ की अवधारणा पर जोर दिए जाने के बीच रामगढ़-विषधारी में जुड़े हुए वन क्षेत्रों के संरक्षण और प्रशासनिक प्रबंधन को एकरूप बनाने की चुनौती अब महत्वपूर्ण हो गई है।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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