अतुल कनक
स्वतंत्र लेखक, स्तंभकार एवं कवि
जब भी मन करता है और मौका होता है- मैं नदी के पास चला जाता हूँ। नदी मुझे अपने अंतस के अभिषेक का सुख देती प्रतीत होती है। हर बार की तरह इस बार भी मैं पूरे नवरात्र मौन रहा। विजयादशमी की सुबह सुबह मैं एक बार फिर कोटा शहर में स्थित भीतरिया कुंड चला गया। हालांकि वहाँ अब नये विकास कार्य के कारण खुदाई आदि का काम चल रहा है लेकिन फिर भी पुराने घाट पर तसल्ली से बैठने लायक स्थान पर्याप्त था और खुदाई कार्य में लगी विशाल मशीनें खामोश खड़ी थीं। मैं बता दूं कि भीतरिया कुंड नामक यह प्राचीन स्थल चंबल के किनारे ही स्थित है। नदी किनारे कुंड होने की बात कुछ लोगों को अजीब सी लग सकती है। भला ही जहाँ पूरी नदी हो, वहां छोटे से कुण्ड का क्या औचित्य। लेकिन बड़े लोगों की यही महत्ता होती है। वो अपने साथ खड़े लोगों को भी छोटा नहीं होने देते। चंबल नदी के किनारे यह जो भीतरिया कुण्ड है, यह भी बहुत महत्वपूर्ण है। कहते हैं कि इस कुण्ड में पानी कहाँ से आता है, कोई नहीं जानता। इस कुण्ड का पानी गौमुख के जरिये चंबल में प्रवाहित होता है। याने कुण्ड एक नदी को समृद्ध कर रहा है। कई बार हमारा परिवेश ही हमें किस तरह समृद्ध करता है, हमें अहसास ही नहीं होता।
नदी के किनारे कुण्ड होने को आश्चर्यजनक नहीं कहा जा सकता। नदी और कुण्ड हैं तो एक ही गौत्र के। इस दृष्टि से दोनों में कोई तो संबंध होगा ही। मनुष्य भले ही अपने समृद्ध रिश्तेदारों को देखकर जलने लगें लेकिन मुझे लगता है कि प्रकृति में अभी यह प्रवृत्ति बलवती नहीं हुई होगी। प्रकृति यदि दूसरों को देखकर ईर्ष्या महसूस करने लगेगी तो फिर प्रलय में क्या कसर रह जाएगी। या यह कहें कि फिर तो प्रलय आ ही जानी चाहिये। प्रकृति तो मुक्त हस्त से अपना सर्वस्व सबके कल्याण के लिये सौंप देती है। सूरज निरंतर जलता रहता है ताकि दुनिया को उजाला, ऊष्मा और ऊर्जा मिलते रहें और चांद उसी सूरज की गर्मी को चांदनी में परिवर्तित करके हमें सौंपता है। नदी अपने मायके से एक लंबे सफर के लिये निकल पड़ती है ताकि दुनिया वाले अपनी प्यास बुझाने के लिये जल प्राप्त कर सकें। फूल खिलता है और बिखर जाता है लेकिन परिवेश को सुगंध बांटता है। अस्तु।
उस दिन मौन की पूर्णाहुति के ठीक पहले चंबल नदी के किनारे गया। नौ दिन माँ दुर्गा की साधना की थी। दुर्गा को हम माँ कहते हैं लेकिन नदी भी तो हमारी माँ ही है। हम माँ के साथ क्या कर रहे हैं? उस दिन जब चंबल किनारे गया तो मैंने देखा कि लोगों ने भीतरिया कुण्ड के घाटों पर उस सामग्री का ढेर लगा रखा है, जो नवरात्र में पूजा के दौरान एकत्र हुई होगी। किनारे पर बैठे एक सज्जन लोगों को मना कर रहे थे कि ये थैलियां किनारे पर ही रख दो, पानी में मत डालो। लेकिन ऐसे आग्रहों को कौन मानता है? हम इस सच को स्वीकारना ही नहीं चाहते कि नदी के जल में इस तरह की सामग्री प्रवाहित करके भी हम अपने पुण्यों को नष्ट करते हैं। पुण्य कमाने की ऐसी अंधी दौड़ में सारा समाज शामिल हो गया है कि उसे सिर्फ दौड़ते रहना ही पुण्यार्जन का एकमात्र रास्ता प्रतीत होता है, भले ही गलत दिशा में ही क्यों न दौड़ना पड़े।
लाल किताब ज्योतिष कहता है कि यदि आप नदी में अपशिष्ट पदार्थ डालते हैं तो आप मातृ़ ऋण के दोषी होते हैं। मातृ ऋण याने आपकी कुण्डली में चंद्रमा खराब फल देने लगता है। ज्योतिष की दृष्टि से चंद्रमा यदि खराब हो तो उसका एक फल यह भी होता है कि आप अंतस की शांति खो देते हैं। मनोरोगी हो जाते हें। क्या दुनिया में मनोरोग बढ़ने का एक कारण यह भी है कि हमने पानी की महत्ता का सम्मान करना बंद कर दिया है? नदी माँ है। हमें इसकी शुचिता का सम्मान करना चाहिये। लेकिन जब लोग जन्म देने वाली माँ से ही दुर्व्यवहार करने में नहीं हिचकिचाते तो फिर नदी की शुचिता का सम्मान कैसे करेंगे? लेकिन किसी दिन नदी ने हमारे व्यवहार का हिसाब करना शुरू कर दिया तो? उस दिन भीतरिया कुण्ड में चंबल नदी के किनारे सूर्योदय की प्रतीक्षा करता हुआ मैं यही सोच रहा था।
