चित्तौड़गढ़। नगर परिषद के आगामी निकाय चुनाव में सभापति पद का आरक्षण गुरुवार को जारी हो गया। आरक्षण लॉटरी में चित्तौड़गढ़ नगर परिषद के सभापति पद को एक बार फिर अनारक्षित रखा गया है। यानी इस बार सभापति पद किसी विशेष वर्ग, महिला या पुरुष के लिए आरक्षित नहीं रहेगा। यह स्थिति शहर की चुनावी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पिछले दो नगर निकाय चुनावों में भी सभापति पद अनारक्षित रहा था। दोनों चुनाव में पुरुष उम्मीदवार सभापति बने। पिछले चुनाव में कांग्रेस का बोर्ड बना था और संदीप शर्मा सभापति चुने गए थे। इससे पहले नगर परिषद में बीजेपी का बोर्ड था और सुशील शर्मा सभापति रहे थे।
कांग्रेस के सामने बोर्ड बचाने की चुनौती
आरक्षण की तस्वीर साफ होने के बाद अब कांग्रेस के सामने अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराकर दोबारा बोर्ड बनाने की चुनौती होगी। अनारक्षित सीट होने के कारण पार्टी के पास सभापति पद के लिए कई संभावित चेहरों में से उम्मीदवार चुनने का विकल्प रहेगा।

वहीं बीजेपी नगर परिषद में फिर से सत्ता हासिल करने की कोशिश करेगी। दोनों प्रमुख दल अब 60 वार्डों में ऐसे उम्मीदवार उतारने की रणनीति बनाएंगे, जो न केवल चुनाव जीत सकें बल्कि बोर्ड गठन के लिए आवश्यक बहुमत जुटाने में भी मदद करें।
सभापति पद पर किसी नेता की दावेदारी केवल उसके व्यक्तिगत चुनाव जीतने तक सीमित नहीं होगी। चुनाव के बाद पर्याप्त पार्षदों का समर्थन हासिल करना भी अहम होगा। ऐसे में पार्टी के भीतर संभावित सभापति चेहरों को लेकर राजनीतिक सक्रियता बढ़ने की संभावना है।
पिछले दो चुनाव में बदली सत्ता
चित्तौड़गढ़ नगर परिषद में पिछले दो चुनावों में सत्ता कांग्रेस और बीजेपी के बीच बदली है। बीजेपी के बोर्ड के दौरान सुशील शर्मा सभापति रहे, जबकि पिछले चुनाव में कांग्रेस ने बोर्ड बनाया और संदीप शर्मा सभापति बने।
अब फिर अनारक्षित सीट होने से दोनों दलों में सभापति पद की दावेदारी सभी वर्गों के लिए खुली रहेगी। चुनाव परिणाम के बाद बहुमत जुटाने वाला राजनीतिक गुट अपने पसंदीदा चेहरे को सभापति बनाने की कोशिश करेगा।
आरक्षण का इतिहास भी चर्चा में
चित्तौड़गढ़ नगर परिषद के सभापति पद का आरक्षण पहले अलग-अलग वर्गों के लिए रहा है। नगर परिषद बनने के शुरुआती दौर में सभापति पद ओबीसी महिला के लिए आरक्षित था। इसके बाद पिछले दो चुनाव में पद अनारक्षित रहा और पुरुष उम्मीदवार सभापति बने।
अब लगातार तीसरी बार अनारक्षित स्थिति रहने से चुनावी मुकाबला और अधिक खुला माना जा रहा है। ऐसे में वार्डवार समीकरण, स्थानीय नेताओं का प्रभाव और चुनाव के बाद पार्षदों का समर्थन सभापति के चयन में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
97 हजार से ज्यादा मतदाता करेंगे फैसला
चित्तौड़गढ़ नगर परिषद में कुल 60 वार्ड हैं और यहां 97,080 मतदाता हैं। इनमें 48,638 पुरुष, 48,438 महिला और 4 ट्रांसजेंडर मतदाता शामिल हैं। चुनाव के लिए कुल 102 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।
मतदाता संख्या में पुरुष और महिला मतदाताओं के बीच ज्यादा अंतर नहीं है। ऐसे में दोनों राजनीतिक दलों के लिए प्रत्येक वार्ड में मजबूत संगठन और प्रभावी उम्मीदवार उतारना चुनौतीपूर्ण होगा। कांग्रेस जहां अपना बोर्ड बचाने की रणनीति बनाएगी, वहीं बीजेपी नगर परिषद में वापसी के लिए जोर लगाएगी।
