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चोरी करना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है

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डॉ. अतुल चतुर्वेदी

स्वतंत्र लेखक, स्तंभकार व कवि

चोरी को लेकर हमारा कॉन्सेप्ट बहुत पुरातनपंथी है। चोरी कोई अपराध नहीं है बल्कि चौंसठ कलाओं में से एक कला है। यह माखन चोरी का युग नहीं है यह आस्था और श्रद्धा चोरी का युग है।

छोटी मोटी चोरियां तो हम आए दिन करते रहते हैं और उसका कोई बुरा भी नहीं मानते। टोल टैक्स की चोरी को तो वी आई पी ट्रीटमेंट माना जाता है समाज में। बड़े नेता से लेकर उसके कारिंदे तक और आला अधिकारियों से लेकर छुटभैया पुलिसवाले तक टोल टैक्स को धता बताते हुए गर्व से निकलते हैं। टोल टैक्स की गाज गिरती है तो आम आदमी पर। बाकी सबके लिए विशेष आख़िरी लाइन है न निकलने को। कार्ड दिखाइए या धमकाइए और निकल जाइए। बैंक से उठाये गए लोन की चोरी तो हमारा शाश्वत अधिकार है। बैंक और सरकारी ऋण होता ही इस पुनीत कार्य के लिए है।

बड़े बड़े उद्योगपति इस चोरी को ठाठ से विदेशों में मौज मार रहे हैं। सरकार ससम्मान उनके एन पी एस को वे ऑफ़ कर देती हैं। बचा हुआ महंगाई के बोझ कराहती हुई जनता उठाती रहती है। जनता होती ही बोझ उठाने के लिए है और चुनो हमको। हम तो ठहरे अमरबेल और हमें चाहिए पोषण। पोषण जिससे होगा शोषण भी उसी का होगा। जनता का धन जन प्रतिनिधियों को अर्पित।

बिजली चोरी हमारा नैतिक अधिकार है। कौन नहीं है इस हमाम में नंगा नहीं है। छोटे किसान से ले कर बड़े व्यवसायी भी। गांवों में बिजली चोरी फ़ैशन है और शहर में बिजली चोरी कला और तकनीक का सम्मिश्रण। उद्योगपति बिजली चोरी को अपराध नहीं कर्तव्य मानता है और झुग्गी झोंपड़ी वाला मजबूरी। सरकार अभियान चलाती रहती है और बिजली चोरी होती रहती है। हमारे देश में चोरी पहले ही कहा कोई ग्लानि बोध का विषय नहीं है बल्कि यह एक किस्म की महारत है , कला है , प्रविधि है। जो जितनी सफ़ाई और कलात्मक तरीके से चोरी कर के न पकड़ा जाये वो उतना बड़ा कलावंत।

किताबों की चोरी चोरी नहीं होती कभी मैक्सिम गोर्की ने कहा था लेकिन किताबें हमारे देश में सर्वाधिक सुरक्षित हैं। हमारे यहाँ किताबों की जरूरत ही किसे है भला जब भावी पीढ़ी वन वीक सीरिज पढ़ कर काम चला रही है तो ? हम कंटेंट की चोरी कर सकते हैं , आइडिये चुरा सकते हैं , कविताएँ चुरा सकते हैं , एम एल ए चुरा सकते हैं, वार्ड पार्षद चुरा सकते हैं लेकिन किताबें भला क्यों चुराएँगे ? रील और मीम्स के युग में उनका भला क्या काम ?

लेकिन इधर क्या हुआ कुछ लोगों ने चंदा चुरा लिया, कुछ ने दान और आस्था चुरा ली। धर्मप्राण जनता हिल गई। चुरायी हुई आस्था और चंदे पर बुलडोजर भी नहीं चलाया जा सकता बस कमेटी गठित की जा सकती है। दुख व्यक्त किया जा सकता है। लेकिन भाई लोग अलग ही एटीट्यूड के हैं चोरी भी कर रहे हैं और सीनाजोरी भी। यही मज़ा है बहुमत और सत्ता का। खाओ भी, गुर्राओ भी। अंग अंग में अलग ही टशन।

सही भी है कोई चन्दा चोरी के लिए भी दुखी होता है क्या? कोई आपका ईमान चुराया हो तो बताओ? नैतिकता चुरायी हो तो शिकायत करो। हमारे दद्दू बोले - भाई साहब आप भी कैसी बातें करते हैं भला ईमान और नैतिकता बची ही कितने लोगों पर है जो कोई चुराएगा उसका तो वैसे ही स्टॉक कम है देश में और जिन पर बची है उनको कोई पूछ नहीं रहा। फ़ैशन और सोशल मीडिया के शोर के युग में खाँटी यथार्थ की बात न करें तो ही अच्छा है।

               (ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं)

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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