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साइबर क्राइम | ऑपरेशन एंटी-वायरस के बाद भी नहीं थमा दुस्साहस

जामताड़ा को पीछे छोड़ सबसे बड़ा सिरदर्द बना 'मेवात मॉडल'

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साइबर क्राइम | ऑपरेशन एंटी-वायरस के बाद भी नहीं थमा दुस्साहस
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देश में साइबर अपराध का नेटवर्क राज्यों की भौगोलिक सीमाओं को लांघ चुका है। कभी झारखंड का जामताड़ा ठगी का एकमात्र गढ़ था, लेकिन आज राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में फैला 'मेवात क्षेत्र' सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। कुछ समय पहले पुलिस के आक्रामक 'ऑपरेशन एंटी-वायरस' से इस नेटवर्क पर गहरी चोट लगी थी। बड़े पैमाने पर हुई गिरफ्तारियों से लगा था कि अपराध की रीढ़ टूट गई है, लेकिन अपराधियों ने नई तकनीक, एडवांस तौर-तरीकों और अंतर-राज्यीय गठजोड़ से इस काले साम्राज्य को फिर खड़ा कर लिया है। अलवर पुलिस की हालिया कार्रवाई इस नेटवर्क की चालाकी की गवाही देती है। पुलिस ने वर्ष 2023 से जनवरी 2026 तक रिकॉर्ड 1.90 लाख संदिग्ध सिम कार्ड और मोबाइल IMEI नंबर ब्लॉक किए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि केवल जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच ही 82,769 सिम और 5,034 IMEI नंबर निष्क्रिय किए गए। इसके बावजूद ठगी का सिलसिला थमा नहीं है। देश में कहीं भी ठगी हो, उसके तार मेवात से ही जुड़ रहे हैं।

इस नए दौर का साइबर अपराध 'पैन-इंडिया' संगठित नेटवर्क है, जो एक खास सिद्धांत पर काम करता है। 'एक राज्य का शिकार, दूसरे राज्य की सिम, तीसरे राज्य का बैंक खाता और मेवात से कॉल।' पुलिस जांच के मुताबिक, पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, मेघालय, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों से फर्जी दस्तावेजों के जरिए थोक में सिम कार्ड हासिल कर मेवात पहुंचाए जाते हैं। वहीं, ठगी की रकम ट्रांसफर करने के लिए असम और बिहार जैसे राज्यों में गरीब लोगों को चंद रुपयों का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते (म्यूल अकाउंट्स) खुलवाए जाते हैं। इसके बाद मेवात के खेतों, अरावली की पहाड़ियों या गुप्त कमरों से कॉल करके लोगों को जाल में फंसाया जाता है।

भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के आंकड़े इस विभीषिका को स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2025 में देश भर में साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की करीब 24.02 लाख शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें 22,495 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी हुई। इसमें डिजिटल अरेस्ट, शेयर ट्रेडिंग फ्रॉड, नकली निवेश, ऑनलाइन लोन और सेक्स्टॉर्शन जैसे तरीके हावी रहे। मेवात के ठगों ने इन आधुनिक तरीकों को तेजी से अपनाया है। वे फोन पर खुद को सीबीआई, ईडी या कस्टम अधिकारी बताकर लोगों को 'डिजिटल अरेस्ट' करते हैं और मिनटों में उनकी गाढ़ी कमाई साफ कर देते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह मॉडल कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि इसमें 'अपराध कहीं और दर्ज होता है और आरोपी कहीं और बैठा होता है।' उदाहरण के लिए, यदि महाराष्ट्र का कोई व्यक्ति शिकार बनता है, तो जांच में सिम बंगाल की, बैंक खाता असम का और कॉलर की लोकेशन राजस्थान-हरियाणा बॉर्डर के किसी सुदूर गांव की मिलती है। जब तक विभिन्न राज्यों की पुलिस समन्वय स्थापित कर पहुंचती है, तब तक रकम कई लेयर्स वाले खातों से होते हुए क्रिप्टोकरेंसी या कैश में गायब हो चुकी होती है।

यही कारण है कि महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, कर्नाटक, दिल्ली, यूपी और एमपी जैसे राज्यों की पुलिस टीमें मेवात बेल्ट में डेरा डाले रहती हैं। ज्यादा नुकसान वाले राज्य: जहां ठगों ने मचाई सबसे बड़ी तबाही

साइबर अपराधियों के निशाने पर देश के वे राज्य सबसे ऊपर हैं जो आर्थिक रूप से समृद्ध हैं और जहां डिजिटल बैंकिंग ऑनलाइन निवेश का चलन बहुत ज्यादा है। I4C और राज्य पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, साइबर ठगी से प्रभावित होने वाले राज्यों की सूची में महाराष्ट्र और कर्नाटक सबसे शीर्ष पर बने हुए हैं। विभिन्न राज्यों में हुई ठगी की डराने वाली राशि इस प्रकार है:

 महाराष्ट्र: 3,203 करोड़ रुपये

 कर्नाटक: 2,413 करोड़ रुपये

 तेलंगाना: 947 करोड़ रुपये

 बिहार: 468 करोड़ रुपये

भौगोलिक - तकनीकी वजह से मेवात जांच एजेंसियों के रडार पर

राजस्थान के अलवर और भरतपुर तथा हरियाणा के नूंह (मेवात) जिले के भौगोलिक त्रिकोण से बना यह क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में देश के भीतर साइबर अपराध का सबसे बड़ा 'हॉटस्पॉट' बनकर उभरा है। यही वजह है कि देश भर की साइबर जांच एजेंसियां मेवात का रुख करती हैं।

भौगोलिक सीमा का लाभ: 3 राज्यों की सीमा पर स्थित होने के कारण अपराधी पुलिस दबिश के दौरान क्षेत्राधिकार बदलकर आसानी से बच निकलते हैं।
अखिल भारतीय सिंडिकेट: गुर्गों के जरिए फर्जी दस्तावेजों और 'म्यूल खातों' (डमी बैंक खाते) का इंतजाम करना इनके लिए आसान है।
स्थानीय पनाह और मुखबिरी: अपराध को 'आय का जरिया' मानने वाले कुछ गांवों से इन्हें सुरक्षित पनाह मिलती है।

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विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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