राजेश जैन
पत्रकार, लेखक एवं स्तंभकार
क समय था जब अफवाहें गांव की चौपाल या शहर की गलियों तक सीमित रहती थीं। उनका प्रभाव व्यापक नहीं होता था। लेकिन सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को सूचना का प्रसारक बना दिया है। आज कोई भी बिना किसी सत्यापन के फोटो, वीडियो या संदेश लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ऐसे में फेक न्यूज़ अब केवल अफवाह नहीं रही। यह अक्सर सुनियोजित अभियान का हिस्सा होती है। चिंताजनक बात यह है कि लोग अक्सर उसी सूचना पर जल्दी विश्वास करते हैं जो उनकी पहले से बनी सोच की पुष्टि करती हो। मनोविज्ञान इसे कन्फर्मेशन बायस कहता है। यही वजह है कि झूठ, यदि वह लोगों की पसंद के अनुरूप हो, तो कई बार सच से भी तेज दौड़ता है।
झूठ का सबसे खतरनाक संस्करण है डीपफेक
फेक न्यूज़ में तो फिर भी शब्दों के जरिए पहुंचा जा सकता था। लेकिन डीपफेक ने तस्वीर ही बदल दी है। अब एआई किसी भी व्यक्ति की आवाज़, चेहरे के हावभाव और बोलने की शैली की हूबहू नकल कर सकता है। कुछ मिनट के वीडियो और ऑडियो के आधार पर ऐसा कंटेंट तैयार किया जा सकता है जिसे देखकर विशेषज्ञ भी पहली नजर में धोखा खा जाएं। यह सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ा खतरा है।
चुनावों पर सबसे बड़ा असर
लोकतंत्र में चुनाव विवेक का उत्सव हैं। यदि नागरिकों तक पहुंचने वाली जानकारी ही झूठी हो जाए, तो उनका निर्णय भी प्रभावित होगा। दुनिया के कई देशों में चुनावों के दौरान फर्जी वीडियो, नकली ऑडियो और भ्रामक पोस्ट का इस्तेमाल देखा गया है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। ऐसे में चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है।
मीडिया की नई परीक्षा
मुख्यधारा का मीडिया भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। पहले समाचार संस्थानों के पास खबर की पुष्टि के लिए पर्याप्त समय होता था। अब सोशल मीडिया पर खबर पहले वायरल होती है और बाद में उसकी जांच होती है। आज पत्रकारिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सबसे पहले खबर देना नहीं, बल्कि सबसे पहले सही खबर देना है।
क्या केवल कानून काफी होगा?
सवाल यह है कि क्या केवल कानून इस समस्या का समाधान कर देगा? शायद नहीं। दरअसल, हर झूठी पोस्ट पर मुकदमा दर्ज करना संभव नहीं है। सबसे पहले जरूरी है डिजिटल जिम्मेदारी।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम नियंत्रण
यहीं सबसे कठिन सवाल खड़ा होता है। यदि सरकार फेक न्यूज़ रोकने के नाम पर अत्यधिक नियंत्रण लागू करे तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। यदि बिल्कुल नियंत्रण न हो तो झूठ और नफरत बिना रोक-टोक फैल सकती है। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक हैं। इसलिए संतुलन आवश्यक है।।
डिजिटल साक्षरता सबसे मजबूत हथियार
स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल साक्षरता को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। यह सिखाया जाना चाहिए- किसी भी वायरल संदेश पर तुरंत विश्वास न करें। स्रोत की जांच करें। वीडियो का संदर्भ देखें। फैक्ट-चेक वेबसाइटों की मदद लें। भावनात्मक संदेशों को विशेष सावधानी से देखें।
एआई नहीं, उसका दुरुपयोग गलत है
यह समझना भी जरूरी है कि समस्या एआई नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब वही तकनीक धोखाधड़ी, ब्लैकमेल, चुनावी हेरफेर और सामाजिक तनाव फैलाने के लिए इस्तेमाल होती है। इसलिए लक्ष्य तकनीक को रोकना नहीं, बल्कि उसके जिम्मेदार उपयोग को सुनिश्चित करना होना चाहिए।
आगे का रास्ता
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को चार स्तरों पर एक साथ काम करना होगा।
पहला- सख्त लेकिन संतुलित कानून।
दूसरा- एआई आधारित तकनीकी समाधान।
तीसरा- जिम्मेदार डिजिटल प्लेटफॉर्म।
चौथा- डिजिटल जागरूक नागरिक।
इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र की लड़ाई केवल संसद, अदालत या चुनावी मैदान में नहीं लड़ी जाएगी। इसका सबसे बड़ा मोर्चा मोबाइल फोन की स्क्रीन होगी। यदि समाज झूठ को पहचानना नहीं सीख पाया तो भविष्य में चुनाव तो होंगे, लेकिन मतदाता भ्रमित होंगे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो होगी, लेकिन सत्य की आवाज़ कमजोर पड़ जाएगी। लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम तकनीक को कितना मानवीय बना पाते हैं और सूचना को कितना विश्वसनीय बनाए रखते हैं। इस परीक्षा में सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। आखिरकार, लोकतंत्र केवल वोट से नहीं चलता, बल्कि सच पर नागरिकों के विश्वास से चलता है।
