हाड़ौती अंचल के सबसे समृद्ध और 'ए' श्रेणी का दर्जा प्राप्त कृषि उपज मंडी इटावा में अव्यवस्थाओं का आलम है। राजस्थान और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों के लगभग 500 गांवों के हजारों किसान अपनी खून-पसीने की उपज (जींस) बेचने इस मंडी में आते हैं। मंडी प्रशासन हर वर्ष करीब 10 करोड़ रुपये का भारी-भरकम राजस्व (टैक्स) वसूलता है, लेकिन इसके बदले में अन्नदाताओं को केवल असुविधाएं, गंदगी की बदबू और उपेक्षा ही हाथ लगती है। मंडी में किसानों को बुनियादी अधिकार नहीं मिल रहे। उन्हें रियायती दर पर भोजन उपलब्ध कराने के लिए 'कलेवा योजना' संचालित है, लेकिन भोजनालय के पास कचरे के विशाल ढेर लगे हुए हैं। चारों तरफ पसरी बदबू के कारण किसान वहां बैठकर भोजन करने से भी कतराते हैं। नाले-नालियां कचरे और सिल्ट से पूरी तरह पटे पड़े हैं, जिससे मानसून के दौरान परिसर में भारी जलभराव का खतरा मंडरा रहा है।
मंडी में लगे सीसीटीवी कैमरे लंबे समय से धूल फांक रहे हैं। बंद पड़े कैमरों के कारण मंडी परिसर में आए दिन किसानों और व्यापारियों की जींस चोरी होने की वारदातें हो रही हैं। पीड़ित पक्ष लगातार शिकायतें कर रहा है, लेकिन मंडी प्रबंधन ने सुरक्षा को पूरी तरह से 'राम भरोसे' छोड़ रखा है। मंडी परिसर की कई रोड लाइट्स और विद्युत पोल टूटे हुए हैं, जिससे रात के समय हादसों का अंदेशा बना रहता है। जनरेटर तक नहीं चलाया जाता। चौंकाने वाली बात यह है कि जनरेटर बंद रहने के बावजूद हर महीने डीजल खरीद के नाम पर बिलों का नियमित भुगतान उठाया जा रहा है, जो एक उच्च स्तरीय जांच का विषय है। इसे लेकर भी व्यवस्था पर कई तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं।
महिला शौचालय नहीं, विश्राम गृह पर भी ताला लगा हुआ
करोड़ों के बजट वाली इस मंडी के नीलामी क्षेत्र में पीने के पानी और सुलभ शौचालय तक की व्यवस्था नहीं है। पुरुष किसान और पल्लेदार तो खुले में जाने को विवश हैं, लेकिन दूर-दराज से आने वाली महिला किसानों के लिए शौचालय का अभाव है। उन्हें बुनियादी मानवीय सुविधाओं के अभाव में बेहद अपमानजनक और कष्टकारी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। 'किसान विश्राम गृह' जर्जर हो चुका है। इस पर हमेशा ताला लटका रहता है, जिससे किसान रात के समय खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं। वाटर कूलर भी बंद पड़े हैं।
10 वर्षों से नहीं बना नया शेड
इटावा और आसपास के क्षेत्रों के विकास के नाम पर बड़े-बड़े वादे होते रहे हैं, लेकिन असलियत यह है कि पिछले एक दशक में मंडी में एक भी नए शेड का निर्माण नहीं हुआ। नीलामी शेड पर समर्थन मूल्य की खरीद का कब्जा होने के कारण किसानों की सामान्य जींस की नीलामी खुले आसमान के नीचे होती है। तेज धूप और बेमौसम बारिश में किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती हैं।
समाधान नहीं मिलने से एसोसिएशनों में आक्रोश
इटावा मंडी की दुर्दशा पर मंडी व्यापार संघ के अध्यक्ष हरिशंकर मंगल ने कहा कि बार-बार शिकायत के बावजूद प्रशासन मूकदर्शक बना है; बंद कैमरों व नाकाफी रोशनी के कारण परिसर में चोरियां हो रही हैं और नए शेड की मांग पर कोई सुनवाई नहीं है। वहीं, पल्लेदार एसोसिएशन के अध्यक्ष जोधराज गुर्जर का कहना है कि नालियां कचरे से पटी होने के कारण पहली बारिश में ही मंडी टापू बन जाती है, और यहाँ पल्लेदारों व किसानों के लिए पीने के पानी और सुलभ शौचालय तक की बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। भारतीय किसान संघ के सह जिला प्रचार प्रमुख उमाशंकर नागर ने कहा कि दो राज्यों के हजारों किसानों से करोड़ों का टैक्स वसूलने के बाद भी उन्हें लावारिस छोड़ दिया गया है। किसान संघ इस घोर प्रशासनिक उपेक्षा के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ेगा।
किसान बोले-सुविधाएं जीरो, प्रशासन नाकाम
मंडी में चहुंओर फैली अव्यवस्थाओं पर खेड़ली बेरीसाल के चंदा लाल मीना ने बताया कि जगह-जगह गंदगी के ढेर और भयंकर बदबू है, जहां पीने का साफ पानी और शौचालय तक उपलब्ध नहीं है। वहीं, रजोपा के बद्रीलाल नागर ने दर्द बयां किया कि फसल की नीलामी खुले में होने से मौसम की मार झेलनी पड़ती है, विश्राम गृह बंद है और आवारा पशुओं का आतंक अलग है। रनोदिया निवासी राकेश बैरवा का कहना है कि राजस्थान और मध्य प्रदेश के सैकड़ों गांवों के किसान यहां भरोसा करके आते हैं, लेकिन प्रशासन उन्हें न्यूनतम बुनियादी सुविधाएं तक मुहैया कराने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।
विश्राम गृह की मरम्मत के लिए बजट के प्रस्ताव भेज
इटावा मंडी में मानसून से पहले नालियों की सफाई करवाई जा रही है। मंडी में सफाई कार्य करवाया जा रहा है। पेयजल, शौचालय, सीसीटीवी कैमरे और अन्य जो समस्याएं हैं, उनको दिखवाकर जल्द ठीक कराने के प्रयास होंगे। किसान विश्राम गृह की मरम्मत के लिए बजट के प्रस्ताव भेज रखे हैं। जो भी समस्याएं हैं, उनका जल्द समाधान कराने के प्रयास होंगे। -रवि सिंह पंवार, मंडी सचिव, इटावा
