पुरुषोत्तम शर्मा @ कोटा
राजस्थान की राजनीति में हाड़ौती संभाग (कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़) का अपना एक अलग और बेहद प्रभावकारी वजूद रहा है। जब भी इस क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीतों, बड़े राजनीतिक अभियानों या चुनावी विजय गाथाओं का विश्लेषण किया जाता है, तो अक्सर मुख्य मंच पर मौजूद दिग्गज चेहरों और वरिष्ठ नेताओं की चर्चा होती है। परंतु राजनीति के गंभीर अध्येताओं और जमीनी हकीकत को समझने वाले जानकारों से अगर बात करें, तो एक बात पूरी स्पष्टता से सामने आती है। मंच पर चमकने वाले चेहरों के पीछे जीत की जो ठोस पटकथा लिखी जाती है, उसकी स्याही किसी और के हाथ में होती है। कोटा और पूरे हाड़ौती क्षेत्र की राजनीति में एक ऐसा ही कद्दावर, सर्वमान्य और बेहद सम्मानित नाम है, हरिकृष्ण बिरला। यह लोसभा स्पीकर ओम बिरला के भाई हैं, जिन्हें कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष नेता तक आदर और अपनेपन के साथ 'छोटा भाई साहब' कहकर पुकारते हैं।
पर्दे के पीछे के असली 'चाणक्य'
बिरला पर्दे के पीछे रहकर संगठन को मजबूती देने और चुनाव दर चुनाव पार्टी का परचम लहराने वाले असली नायक हैं। पार्षद स्तर के नगर निकाय चुनावों से लेकर विधायक और देश के सबसे बड़े लोकसभा (सांसद) चुनावों तक, उन्होंने अपनी अद्वितीय राजनीतिक सूझबूझ, सूक्ष्म चुनावी गणित और अचूक रणनीतिक क्षमता का लोहा हर बार मनवाया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बिरला की सबसे बड़ी ताकत उनका सटीक जमीनी बूथ मैनेजमेंट और क्षेत्र की जटिल सामाजिक व भौगोलिक परिस्थितियों की गहरी समझ है।
निकाय चुनाव: स्थानीय स्तर पर 'छोटा भाई साहब' की पकड़ अद्भुत मानी जाती है। बूथ स्तर के आम कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद स्थापित करना, स्थानीय असंतोष या नाराजगी को तुरंत भांपकर रूठे हुए कार्यकर्ताओं को मनाना तथा उन्हें पुनः पार्टी के पक्ष में सक्रिय करना उनकी कार्यप्रणाली का मुख्य हिस्सा है।
विधानसभा चुनाव: राज्य की सत्ता तय करने वाले विधानसभा चुनावों के दौरान प्रत्याशी चयन से जुड़े जमीनी फीडबैक से लेकर क्षेत्रवार प्रचार की व्यापक रूपरेखा तैयार करने में उनका सुझाव और रणनीति निर्णायक भूमिका निभाती है।
लोकसभा चुनाव: सांसद स्तर के विशाल और विस्तृत संसदीय क्षेत्रों के चुनावों में विपक्ष द्वारा तैयार किए गए चक्रव्यूह को ध्वस्त करने का काम बिरला की बनाई गई बारीक रणनीतियाँ करती हैं। किस पॉकेट में किस तरह की घेराबंदी करनी है और जनमत को कैसे पार्टी के पक्ष में मोड़ना है, इसमें उनका कोई सानी नहीं है।
किंग नहीं, किंगमेकर': पद की लालसा से परे बिरला
वर्तमान दौर की आपाधापी वाली राजनीति में जहाँ पद, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ ही अधिकांश नेताओं की कार्यशैली तय करती हैं, वहीं हरिकृष्ण बिरला एक अनूठी मिसाल पेश करते हैं। सत्ता और प्रत्यक्ष पद की दौड़ से वे हमेशा कोसों दूर रहे हैं। उनके मन में स्वयं किसी संवैधानिक या राजनीतिक पद (जैसे मंत्री, विधायक, सांसद या चेयरमैन) को पाने की कभी कोई लालसा नहीं रही। यही कारण है कि उन्हें राजनीति में एक अलग व्यक्तित्व माना जाता है। राजनीतिक हलकों और कार्यकर्ताओं के बीच यह बात बहुत गर्व और सम्मान के साथ दोहराई जाती है कि छोटा भाई साहब खुद कभी पद स्वीकार नहीं करते, बल्कि वे दूसरों को पद और प्रतिष्ठा के मुकाम तक पहुँचाने का सबसे भरोसेमंद माध्यम बनते हैं। वे किसी 'किंग' की भांति सिंहासन पर बैठने के बजाय संगठन के कुशल शिल्पकार और 'किंगमेकर' की भूमिका निभाना पसंद करते हैं। उन्होंने हाड़ौती में नए और युवा नेतृत्व को गढ़ा है, निखारा है और उन्हें आगे बढ़ाकर नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया है।
हाड़ौती में भाजपा के संकटमोचक और मजबूत स्तंभ
हाड़ौती संभाग को लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का अभेद्य किला माना जाता है। कोटा शहर में इस किले की नींव को मजबूती प्रदान करने वाले आधार स्तम्भों में हरिकृष्ण बिरला की पर्दे के पीछे की गई अनवरत और निःस्वार्थ मेहनत सबसे प्रमुख है। जब-जब संगठन के भीतर कोई अंतर्विरोध उत्पन्न होता है, किसी मुद्दे पर गतिरोध बनता है या चुनावी राह में अचानक कोई चुनौती खड़ी होती है, तो पार्टी नेतृत्व सबसे पहले उनकी ओर देखता है। वे हर कार्यकर्ता और नेता को साधने की क्षमता रखते हैं। शांत, गंभीर, संयमित और सबको साथ लेकर चलने वाली कार्यशैली जटिल से जटिल समस्याओं का सहजता से समाधान निकाल लेती है। बिना किसी शोर-शराबे और प्रचार-प्रसार के काम करने की यह कला ही उन्हें पार्टी का असली संकटमोचक बनाती है। आम कार्यकर्ता बिरला की इस निःस्वार्थ संगठनात्मक क्षमता और निष्ठा का हृदय से सम्मान करता है। सही मायने में वो भाजपा की हर ऐतिहासिक जीत के नेपथ्य नायक हैं, जिनके बिना कोटा की आधुनिक राजनीति का इतिहास अधूरा ही रहेगा।
