गलवान की झड़प ने भारत और चीन के रिश्तों में ऐसी दरार पैदा की, जिसे केवल हाथ मिलाकर भरना संभव नहीं है। 15 जून 2020 के बाद अविश्वास गहराया, सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ी और आर्थिक संबंधों पर भी तनाव की छाया पड़ी। अब संवाद और रिश्ते सामान्य करने की कोशिशें नई संभावनाएं खोल रही हैं। लेकिन इस बदलाव को दोस्ती की वापसी मान लेना जल्दबाजी होगी। इसके पीछे बदलती वैश्विक राजनीति है और चीन की आर्थिक जरूरतें भी। भारत के लिए सवाल यही है कि वह इन जरूरतों को अपने हित में कितना बदल पाता है।
दोनों देशों के रिश्तों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सीमा पर आमने-सामने खड़े देश व्यापार में गहराई से जुड़े हैं। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, द्विपक्षीय व्यापार करीब 151.5 अरब डॉलर है, जबकि भारत का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर से अधिक है। यह असंतुलन बताता है कि व्यापारिक संबंधों में खरीद और बिक्री का पलड़ा किस तरफ झुका हुआ है।
भारत चीन के लिए महज पड़ोसी नहीं, विशाल बाजार है। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार उपकरण और दवा उद्योग के कच्चे माल तक चीनी आपूर्ति की मजबूत मौजूदगी है। इसलिए चीन से दूरी बनाना जितना आसान नारा है, उतना आसान आर्थिक निर्णय नहीं। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। भारतीय उद्योगों को चीनी कलपुर्जे चाहिए तो चीनी कंपनियों को भारतीय ग्राहक। यह जरूरत एकतरफा नहीं है, भले इसकी प्रकृति और तीव्रता अलग हों।
चीन की घरेलू आर्थिक चुनौतियां उसकी विदेश नीति को भी प्रभावित करती हैं। अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव, रियल एस्टेट संकट, कमजोर घरेलू खपत और रोजगार की चिंताओं के बीच उसे बड़े बाजारों की जरूरत है। उत्पादन क्षमता तभी ताकत बनती है, जब उत्पाद खरीदने वाले मिलें। भारत की बड़ी आबादी और बढ़ती मांग इस लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे में भारत के साथ खुला टकराव चीन के लिए आर्थिक अवसरों को जोखिम में डालना भी है। व्यापारिक संपर्क बढ़ाकर राजनीतिक रिश्तों में सामान्यता लाने की कोशिश इसी पृष्ठभूमि में समझी जानी चाहिए। हालांकि आर्थिक मजबूरी से पैदा हुई नरमी को रणनीतिक सोच में स्थायी बदलाव मान लेना भूल होगी। बाजार की जरूरत और सीमा पर व्यवहार, दोनों को अलग-अलग कसौटियों पर परखना होगा।
संबंध सुधरने से भारत को स्पष्ट लाभ हो सकते हैं। सीमा पर तनाव घटे तो सैन्य दबाव कम होगा। उद्योगों को कच्चे माल और कलपुर्जों की आपूर्ति में स्थिरता मिलेगी। व्यापार और निवेश के अवसर बढ़ सकते हैं। लेकिन इन्हीं सुविधाओं के सहारे पुरानी निर्भरता बढ़ गई तो राहत भविष्य की कमजोरी बन सकती है।
इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर उपकरण, बैटरी, दुर्लभ खनिज और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में यह सावधानी जरूरी है। भारत को व्यापार के दरवाजे खोलते हुए घरेलू उत्पादन, तकनीकी क्षमता और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत मजबूत करने होंगे। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कटना नहीं, संकट के समय विकल्प होना है। चीन से कारोबार जारी रहे, लेकिन किसी जरूरी क्षेत्र की चाबी अकेले उसके हाथ में न रहे।
ब्रिक्स दोनों देशों को साथ बैठने का मंच देता है, लेकिन साझा मंच का अर्थ साझा रणनीति नहीं होता। चीन इसे अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था के मुकाबले प्रभाव बढ़ाने के अवसर के रूप में देख सकता है। भारत के लिए इसकी उपयोगिता विकासशील देशों की आवाज, आर्थिक सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में संतुलित प्रतिनिधित्व बढ़ाने में है।
भारत की चुनौती होगी कि वह ब्रिक्स में सक्रिय रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखे। चीन के साथ सहयोग के लिए अमेरिका से टकराव अनिवार्य नहीं, जैसे अमेरिका से साझेदारी के लिए चीन से हर संवाद बंद करना जरूरी नहीं। भारत की ताकत किसी खेमे में समाने से नहीं, अपने निर्णयों की स्वतंत्रता से निकलेगी।
सीमा विवाद, पाकिस्तान, हिंद महासागर और तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे किसी मुलाकात से समाप्त नहीं होंगे। इसलिए भविष्य का व्यावहारिक रिश्ता नियंत्रित प्रतिस्पर्धा का हो सकता है। मतभेद रहें, लेकिन सैन्य तनाव बेकाबू न हो। व्यापार चले, लेकिन रणनीतिक निर्भरता न बढ़े। बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग हो, लेकिन राष्ट्रीय हितों पर समझौता न हो।
असली परीक्षा घोषणाओं से आगे है। बातचीत का महत्व तभी होगा, जब सीमा पर स्थिरता और व्यापार में संतुलन दिखाई दे। चीन को भारतीय बाजार चाहिए तो भारत को बदले में बेहतर बाजार पहुंच, भारतीय कंपनियों के लिए अवसर, तकनीकी सहयोग और व्यापार घाटे में कमी की ठोस अपेक्षा रखनी चाहिए। केवल आयात बढ़ जाना रिश्तों की सफलता नहीं कहलाएगा।
भारत के लिए समझदारी का रास्ता संवाद और तैयारी साथ लेकर चलना है। रिश्तों की गर्मजोशी से ज्यादा जरूरी सौदे की बराबरी होगी।
संवाद और रिश्ते सामान्य करने की कोशिशें नई संभावनाएं खोल रही हैं। लेकिन इस बदलाव को दोस्ती की वापसी मान लेना जल्दबाजी होगी। इसके पीछे बदलती वैश्विक राजनीति है और चीन की आर्थिक जरूरतें भी।
