इटावा। ज्ञान, धन, पद, बल या सुंदरता का अभिमान नहीं करना चाहिए। अहंकार एक विष के समान है, जबकि हृदय की कोमलता और नम्रता ही वास्तविक मार्दव धर्म है। यह बात ज्ञान भारती संस्था, मथुरा से आए विद्वान अनिल जैन शास्त्री ने दसलक्षण पर्व के दूसरे दिन प्रवचन में कही। जैन समाज की ओर से उत्तम मार्दव धर्म की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की गई।
शास्त्री ने कहा कि विनम्र व्यक्ति ही जीवन में वास्तविक सुख और शांति प्राप्त करता है। जवानी, धन और जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर हैं। इसलिए अभिमान छोड़कर गुणवानों और बड़ों का आदर करना चाहिए। जब तक मन में घमंड रहता है, आत्मकल्याण संभव नहीं है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों पर नियंत्रण से ही आत्मशुद्धि की जा सकती है।
मंदिर में सुबह सात बजे भगवान का अभिषेक और शांतिधारा हुई। इसके बाद श्रद्धालुओं ने दसलक्षण पर्व की पूजा-अर्चना की। शाम को बच्चों की पाठशाला और भगवान की महाआरती हुई। रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
इस अवसर पर समाज अध्यक्ष नवनीत जैन, महामंत्री मनोज जैन, कोषाध्यक्ष पीयूष जैन, सांस्कृतिक मंत्री ऋषभ जैन, संरक्षक चेतन पाटनी, खातोली के पूर्व सरपंच बाहुबली जैन, अरुण जैन, मुन्नालाल पाटोदी, मूलचंद जैन और अमोलक जैन सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
