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चांद के दीदार तक इंतजार, प्रेम और विश्वास का पर्व है करवा चौथ

सरगी से सरगी की थाली तक सजी परंपराएं, छलनी से चांद देखने की रस्म में झलकता है दांपत्य जीवन का भावनात्मक जुड़ाव

संवाददाता
विशेष संवाददाता विशेष रिपोर्टर
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नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा

कोटा। आसमान में चांद निकलने का इंतजार, हाथों में सजी मेहंदी, पारंपरिक परिधान और पूजा की थाली। करवा चौथ सिर्फ एक व्रत नहीं, बल्कि भारतीय परिवारों में प्रेम, विश्वास और साथ निभाने की भावना से जुड़ा पर्व है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला यह त्योहार गुरुवार, 29 अक्टूबर को मनाया जाएगा। उत्तर भारत के साथ राजस्थान में भी इस पर्व को लेकर महिलाओं में उत्साह रहता है।

सरगी से शुरू होता है दिन, चांद पर पूरी होती है प्रतीक्षा

करवा चौथ की सुबह सूर्योदय से पहले सरगी खाने की परंपरा है। सास की ओर से बहू को सरगी देने की रस्म में फल, मिठाइयां, सूखे मेवे और अन्य खाद्य सामग्री शामिल होती है। इसके बाद महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। परंपरागत रूप से यह निर्जला व्रत होता है, जिसमें सूर्योदय से चंद्रोदय तक अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता।

दिनभर की व्यस्तता के बीच शाम होते ही तैयारियां तेज हो जाती हैं। महिलाएं सोलह शृंगार करती हैं, हाथों में मेहंदी सजाती हैं और पूजा की थाली तैयार करती हैं। कई जगह महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा करती हैं और करवा चौथ की कथा सुनती हैं। करवा यानी जलपात्र इस पर्व की प्रमुख पारंपरिक वस्तुओं में से एक है।

छलनी से चांद और जीवनसाथी के दीदार की रस्म

करवा चौथ की सबसे खास रस्म चंद्रोदय के बाद निभाई जाती है। महिलाएं छलनी से चांद को देखती हैं और फिर उसी छलनी से पति का चेहरा निहारती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों पानी पीकर व्रत खोलने की परंपरा भी प्रचलित है। इस रस्म में धार्मिक आस्था के साथ दांपत्य जीवन के प्रति समर्पण और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीकात्मक रूप दिखाई देता है।

परंपरा के साथ बदल रही है उत्सव की तस्वीर

समय के साथ करवा चौथ मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया है। पहले जहां यह पर्व मुख्य रूप से महिलाओं के उपवास और पूजा से जुड़ा माना जाता था, वहीं अब कई परिवारों में पति भी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं। सामाजिक मेल-मिलाप, ऑनलाइन शुभकामनाओं, सजावट और पारंपरिक परिधानों ने भी इस त्योहार को नए रंग दिए हैं।

हालांकि उत्सव की बाहरी चमक से अलग, इस पर्व का मूल भाव रिश्ते में विश्वास, एक-दूसरे के प्रति सम्मान और साथ निभाने की प्रतिबद्धता है। बदलते समय में दांपत्य संबंधों की समझ भी व्यापक हुई है। ऐसे में करवा चौथ की परंपरा को आपसी देखभाल और साझेदारी की भावना से जोड़कर देखा जा रहा है।

आस्था के साथ सेहत का ध्यान भी जरूरी

करवा चौथ का व्रत कई महिलाओं के लिए भावनात्मक और धार्मिक महत्व रखता है। फिर भी पूरे दिन बिना भोजन और पानी के रहना कुछ लोगों के लिए परेशानी पैदा कर सकता है। कमजोरी, चक्कर या अस्वस्थता महसूस होने पर शरीर के संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। व्रत रखने या उसमें बदलाव करने का निर्णय अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर लेना उचित है।

करवा चौथ का संदेश केवल चांद निकलने तक प्रतीक्षा करने में नहीं, बल्कि जीवन के हर मोड़ पर एक-दूसरे का साथ निभाने में भी छिपा है। चंद्रमा के दीदार के साथ खुलने वाला व्रत उन भावनाओं की याद दिलाता है, जिनमें प्रेम, विश्वास और साझेदारी किसी भी रिश्ते की असली ताकत बनते हैं।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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