कोटा। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा के तत्वावधान में चातुर्मास के दौरान नियमित प्रवचन जारी हैं। आचार्य भगवान 1008 श्री हीराचंद जी म.सा. एवं भावी आचार्य श्री महेंद्र मुनि जी म.सा. के आज्ञानुवर्ती संत रत्न पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा., पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. एवं पूज्य श्री जितेंद्र मुनि जी म.सा. के सानिध्य में धर्मसभा आयोजित हुई।
शुक्रवार को प्रवचन में योगेश मुनि जी ने कहा कि मनुष्य जीवन में श्रम, समय और शक्ति का विशेष महत्व है। इन तीनों का सदुपयोग आत्मकल्याण और आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया जाना चाहिए। व्यक्ति को वही सुनना चाहिए, जो उसकी आत्मा के लिए हितकारी और कल्याणकारी हो। आत्महितकारी वचनों का श्रवण मनुष्य को सुख और सद्मार्ग की ओर ले जाता है।
उन्होंने श्रावक के तीन भेद—पाक्षिक, नैष्ठिक और साधक—के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि श्रावक का जीवन केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके आचरण में भी धर्म दिखाई देना चाहिए। सत्संग, जिनवाणी और संतों के उपदेश व्यक्ति को सही दिशा प्रदान करते हैं। श्रम, समय और शक्ति का सार्थक उपयोग जीवन को सफल बनाने के साथ आत्मकल्याण के मार्ग को भी प्रशस्त करता है।
विज्ञान ने रोग घटाए, मन की बीमारियां बढ़ीं : जितेंद्र मुनि
पूज्य जितेंद्र मुनि जी ने आधुनिक विज्ञान और बदलती जीवनशैली का उदाहरण देते हुए कहा कि चिकित्सा विज्ञान ने चेचक, पोलियो और टीबी जैसी कई बीमारियों की रोकथाम एवं उपचार में प्रगति की है, लेकिन मनुष्य के विचारों और व्यवहार से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं।
उन्होंने कहा कि ईर्ष्या, द्वेष, असहिष्णुता, क्रोध, अहंकार और अत्यधिक इच्छाओं जैसी मानसिक प्रवृत्तियों का समाधान आत्मचिंतन, संयम और धर्म के माध्यम से किया जा सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मलेरिया घट रहा है, लेकिन मोह-माया बढ़ रही है। टीबी पर नियंत्रण के प्रयास हो रहे हैं, वहीं टीवी और मोबाइल के प्रति अत्यधिक आकर्षण बढ़ रहा है। चेचक कम हो रही है, लेकिन परिवार और समाज में आपसी विवाद बढ़ रहे हैं।
जितेंद्र मुनि ने कहा कि मनुष्य बाहरी स्वच्छता पर ध्यान देता है, लेकिन भीतर व्याप्त क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और पक्षपात जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए उतना गंभीर नहीं है। वास्तविक आत्मशुद्धि के लिए मन की गंदगी को दूर करना जरूरी है।
उन्होंने पटाखों के अत्यधिक उपयोग और ध्वनि प्रदूषण पर भी चिंता जताते हुए कहा कि केवल बाहरी स्वच्छता का संदेश पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यक्ति को अपने आचरण में भी सुधार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि धन-संपत्ति, पारिवारिक संबंधों और जमीन को लेकर अत्यधिक मोह कई बार विवाद और वैमनस्य का कारण बनता है। साधनों का होना अच्छी बात है, लेकिन साधनों के अभाव में दुखी होना उचित नहीं है।
धर्मसभा में दोनों संतों ने आत्मचिंतन, सेवा, तपस्या, सहनशीलता और सद्भावना का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि धर्म की सार्थकता तभी है, जब उसका प्रभाव व्यक्ति के विचारों, वाणी और व्यवहार में दिखाई दे।
संघ अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि नियमित प्रवचन सभी के लिए कल्याणकारी हैं और साधक को निरंतर सद्मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं। संघ मंत्री अनिल दक ने बताया कि प्रवचन में हर आयुवर्ग के लोग पहुंच रहे हैं और धर्मज्ञान के साथ व्यवहारिक ज्ञान भी प्राप्त कर रहे हैं।
