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सत्ता के शिखर पर भी अमर रही आत्मीयता

ट्यूशन की बेंच से उप-महापौर की कुर्सी तक 38 वर्षों की अटूट मित्रता और 'विवेक' का विकास-सफ़र

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नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा

आज के आधुनिक एवं उपभोक्तावादी दौर में जहाँ सत्ता की चकाचौंध, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और ओहदों की दौड़ में पुराने आत्मीय रिश्ते अक्सर धुंधले पड़ जाते हैं, वहीं राजस्थान की शिक्षा नगरी कोटा से सामने आया तीन मित्रों का यह किस्सा निष्कपट प्रेम, समर्पण और जन-सेवा की एक अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत करता है। यह कहानी है—विवेक राजवंशी, कुलदीप माथुर और शैशव भटनागर की। इन तीनों का सफर केवल एक व्यक्तिगत घनिष्ठता का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह इस बात का विश्लेषणात्मक प्रमाण है कि जब मित्रता में स्वार्थ और कपट की जगह निष्ठा और वफ़ादारी ले लेती है, तो वह किस प्रकार चरित्र निर्माण, संघर्षों से उबरने और सार्वजनिक जीवन में स्थायी सफलता की सबसे सुदृढ़ नींव बनती है।

बदलते देखा है ज़माने को अक्सर ओहदों के साथ,

मगर कुछ रिश्ते वक्त की हर शर्त जीत लेते हैं।

कुर्सी भी न झुका सकी जिसकी सादगी को कभी,

वो दोस्त इतिहास के पन्नों में अमरता लिख देते हैं।

वर्ष 1988 में महज 18 वर्ष की ऊर्जावान अवस्था में एक साधारण ट्यूशन क्लास की लकड़ी की बेंच से शुरू हुआ यह आत्मीय सफर आज 56 वर्ष की परिपक्व उम्र में उप-महापौर के गरिमामय पद तक पहुँच चुका है। किंतु इस 38 वर्षों के लंबे कालखंड में न तो आपसी आत्मीयता का संवेग कम हुआ और न ही संडे के नाश्ते की परंपरा का स्वर्णिम नियम बदला।

1988 का ऐतिहासिक मोड़: ट्यूशन की बेंच से पारिवारिक आत्मीयता का ताना-बाना

1988 के उस ऐतिहासिक मोड़ पर जब विवेक, कुलदीप और शैशव एक ट्यूशन क्लास में पहली बार आमने-सामने आए, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह साधारण सी मुलाकात आने वाले चार दशकों के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य का सबसे खूबसूरत अध्याय लिखने जा रही है। ट्यूशन तो महज नियति का एक माध्यम था, असल में नियति इन तीनों सहपाठियों को स्नेह और भरोसे के अनूठे सूत्र में पिरो रही थी। यह प्रगाढ़ होती दोस्ती जल्द ही पढ़ाई के कमरों से बाहर निकलकर पारिवारिक आँगनों तक जा पहुँची। तलवंडी स्थित शैशव और कुलदीप के निवास पर विवेक का सहज आगमन शुरू हुआ, जहाँ प्रत्येक रविवार को आदरणीया माता जी के हाथों से बना गरमा-गरम नाश्ता विवेक की जीवनशैली का अभिन्न अंग बन गया। विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखें तो इस त्रिमूर्ति की सबसे बड़ी ताकत विवेक राजवंशी का सर्व-समावेशी, सौम्य और बहुआयामी व्यक्तित्व रहा। वे न केवल अपने हमउम्र साथियों में लोकप्रिय थे, बल्कि वयोवृद्धों के प्रति अगाध आदर और बच्चों के साथ निष्छल बाल-सुलभ आत्मीयता रखने की अद्भुत क्षमता रखते थे। समय चक्र चला और तीनों परिणय सूत्र में बँधे, परंतु विवाह के उपरांत पारिवारिक दायरा सिकुड़ने के बजाय और विस्तृत तथा प्रगाढ़ हो गया। तीनों मित्रों की जीवनसंगिनियाँ भी इस भावनात्मक डोर से जुड़ गईं और आज वे आपस में बहनों जैसी प्रगाढ़ सहेलियाँ हैं।

संघर्ष, संकल्प और कायाकल्प: कचरा-पॉइंट से 'नंबर वन' निहारिका पार्क तक का भगीरथ प्रयास

रास्तों की धूल भी लगन से गुलाब होती है,

सच्चे दोस्तों की टोली जहाँ साथ होती है।

उजड़े चमन भी खिल उठते हैं उस लगन से,

जिसकी नींव में स्वार्थ नहीं, सिर्फ़ निष्ठा होती है।

राजनीतिक एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य में विवेक राजवंशी के व्यक्तित्व का सबसे अनुकरणीय पहलू उनका अद्वितीय 'जुनून', 'दृढ़ संकल्प' और 'दूरदृष्टि' है। जब विवेक ने जीवन में पहली बार पार्षद का चुनाव लड़ने की दुष्कर राह चुनी, तब उनके दोनों सहचरों—कुलदीप और शैशव—ने इस चुनावी समर को अपनी व्यक्तिगत साख और प्रतिष्ठा की कसौटी मान लिया। लगातार 20 दिनों तक तीनों मित्रों ने अपने-अपने गृह-त्याग की भांति दिन-रात एक कर दिया और चुनावी जनसंपर्क में अपना पसीना बहाया।

इस ऐतिहासिक चुनाव में मिली विजय के पश्चात विवेक ने जिस 'विकासवादी राजनीति' की आधारशिला रखी, उसका जीवंत प्रतीक तलवंडी स्थित 'निहारिका पार्क' है। जिस स्थान पर पूर्व में दुर्गंधयुक्त कचरे का अंबार हुआ करता था और जहाँ से आमजन निकलने में भी संकोच करते थे, उस बंजर स्थल को विवेक ने अपनी दूरदर्शिता और अथक परिश्रम से कोटा शहर का 'नंबर वन' मनोरम और सुंदर पार्क बना दिया। यह कायाकल्प स्पष्ट करता है कि जब किसी जनप्रतिनिधि के पास निष्कपट मित्रों की निष्ठावान टीम और धरातल से जुड़ाव होता है, तो वह असंभव लगने वाले परिवर्तनों को भी साकार कर सकता है।

उप-महापौर का पद और 38 साल पुरानी परंपरा समय-पाबंदी और सादगी का अद्वितीय संगम

सार्वजनिक जीवन का यह कड़वा सच रहा है कि उच्च पद, प्रतिष्ठा और सत्ता मिलते ही अक्सर व्यक्तियों के आचरण, प्राथमिकताएं और व्यक्तिगत संबंध बदलने लगते हैं। किंतु विवेक राजवंशी के संदर्भ में यह पारंपरिक धारणा पूरी तरह धराशायी हो गई।

हाल ही में जब वे कोटा के उप-महापौर के रूप में निर्वाचित हुए, तो शनिवार की देर रात तक संपूर्ण नगर में भव्य विजय जुलूस और उत्सव का उल्लास छाया रहा। देर रात तक चले इस सघन और थका देने वाले घटनाक्रम के पश्चात परिजनों और शुभचिंतकों को लगा कि उप-महापौर पद संभालने के बाद विवेक रविवार की सुबह विश्राम करेंगे। यहाँ तक कि कुलदीप ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा भी कि "नेताजी अब उप-महापौर बन गए हैं, वे भला अब पूर्व की भांति हमारे साथ नाश्ते पर थोड़े ही आएँगे! परंतु रविवार की अलसुबह जो दृश्य देखने को मिला, उसने इस 38 वर्षीय मित्रता के अध्यात्म और गरिमा पर विजय की अंतिम मुहर लगा दी। सदैव की भांति समय के पाबंद विवेक, देर रात की थकान, उल्लास और नए पद के प्रभाव को परे धकेलते हुए, सुबह ठीक निर्धारित समय पर अपने मित्रों के द्वार पर संडे नाश्ते की 38 साल पुरानी अनवरत परंपरा निभाने पहुँच गए।

आधुनिक जन-नेतृत्व के लिए अनुकरणीय सीख

विवेक राजवंशी का ट्यूशन की बेंच से आरंभ होकर उप-महापौर के पद तक पहुँचने का यह सफर केवल एक राजनीतिक उपलब्धि भर नहीं है, बल्कि यह इस गूढ़ जीवन-दर्शन का विश्लेषण है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना ही वास्तविक महानता है। हंसमुख स्वभाव, जन-सामान्य से घुलने-मिलने की सहज कला, समय की अनुशासित प्रतिबद्धता और हर परिस्थिति में अपनों का साथ निभाना—ये वे दुर्लभ सद्गुण हैं जो एक सामान्य कार्यकर्ता को जन-जन का प्रिय नेता बनाते हैं। कुलदीप माथुर एलबीएस ग्रुप चैयरमेन और शैशव भटनागर जरनल मैनेजर सेल्स भाटिया एंड कंपनी का निस्वार्थ समर्पण तथा विवेक राजवंशी की अटूट निष्ठा यह सिद्ध करती है कि राजनीति के इस दौर में भी यदि संबंधों में सत्यता हो, तो 'मित्रता की यह मिसाइल' सफलता और जन-सेवा के नित नए कीर्तिमान स्थापित करती रहती है।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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