ADVERTISEMENT
ब्रेकिंग न्यूज़
• हाड़ौती अंचल: कोटा में नए रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट के लिए 120 करोड़ का अतिरिक्त बजट स्वीकृत • चुनाव आयोग ने आगामी निकाय चुनाव हेतु वोटर लिस्ट अपडेशन की समय सीमा बढ़ाई • राजस्थान बोर्ड परीक्षा 2026 की समय सारिणी घोषित, शिक्षा विभाग की बड़ी तैयारी • टी20 वर्ल्ड कप: भारतीय टीम ने दूसरे मुकाबले में भी दर्ज की धमाकेदार जीत
नागरिक अभिव्यक्ति
होम / शहर / लेख विस्तार
शहर

अखाड़े की मिट्टी से बनाया रावण, पैरों से कुचलकर निभाई 150 साल पुरानी परंपरा; कोटा में अनोखा दशहरा

संवाददाता
विशेष संवाददाता विशेष रिपोर्टर
अक्षर आकार:
अखाड़े की मिट्टी से बनाया रावण, पैरों से कुचलकर निभाई 150 साल पुरानी परंपरा; कोटा में अनोखा दशहरा
अखाड़े की मिट्टी से बनाया रावण, पैरों से कुचलकर निभाई 150 साल पुरानी परंपरा; कोटा में अनोखा दशहरा
ADVERTISEMENT
खबर शेयर करें:

कोटा। देशभर में जहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं कोटा के नांता में जेठी समाज की ओर से दशहरा मनाने की अनूठी परंपरा निभाई गई। यहां अखाड़े की पवित्र मिट्टी से रावण का प्रतीकात्मक स्वरूप तैयार किया गया और विजयदशमी के दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद उसे पैरों से रौंदा गया। जेठी समाज की यह परंपरा करीब 150 साल पुरानी बताई जाती है।

नांता के बड़ा अखाड़े में निभाई अनोखी परंपरा

विजयदशमी के अवसर पर कोटा के नांता स्थित बड़ा अखाड़ा परिसर में जेठी समाज ने अपनी पारंपरिक रस्म निभाई। इस दौरान मिट्टी से बनाए गए प्रतीकात्मक रावण की पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद बच्चों ने रावण की आकृति को पैरों तले रौंदा। इस परंपरा को बुराई पर अच्छाई की जीत और अहंकार के अंत का प्रतीक माना जाता है।

किशोरपुरा और नांता स्थित जेठी समाज के अखाड़ों में हर साल दशहरे पर इसी अनूठे अंदाज में रावण वध की परंपरा निभाई जाती है। यहां अन्य स्थानों की तरह रावण का विशाल पुतला बनाकर जलाने के बजाय अखाड़े की मिट्टी से रावण का स्वरूप तैयार किया जाता है।

श्राद्ध पक्ष की शुरुआत में तैयार किया रावण

जेठी समाज की परंपरा के अनुसार, श्राद्ध पक्ष की शुरुआत में अखाड़े की पवित्र मिट्टी एकत्र की गई थी। इसी मिट्टी से रावण की आकृति तैयार की गई और उस पर ज्वारे उगाए गए। नवरात्र के दौरान नौ दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए गए।

इस अवधि में मंदिर के गर्भगृह के मुख्य पट बंद रहे। केवल पुजारी और व्यवस्थापकों को अंदर प्रवेश की अनुमति थी, जबकि आम श्रद्धालुओं ने बाहर से ही दर्शन और पूजा-अर्चना की।

नौ दिनों की पूजा के बाद विजयदशमी पर पूर्णाहुति

नवरात्र के नौ दिनों तक चले विशेष गरबा और पूजा-अर्चना के बाद विजयदशमी के दिन धार्मिक अनुष्ठान पूर्णाहुति के साथ संपन्न हुए। इसके बाद प्रतीकात्मक रावण को पैरों से रौंदने की रस्म निभाई गई।

समाज की इस परंपरा में धार्मिक मान्यताओं के साथ अखाड़ों की प्राचीन खेल संस्कृति भी जुड़ी हुई है। रावण वध की रस्म पूरी होने के बाद अखाड़े में पारंपरिक कुश्ती के मुकाबले आयोजित किए गए, जिनमें पहलवानों ने अपने दांव-पेच और शारीरिक दमखम का प्रदर्शन किया।

रावण वध के साथ जीवित है अखाड़ों की पुरानी परंपरा

कोटा के नांता और किशोरपुरा में निभाई जाने वाली यह परंपरा दशहरे को एक अलग पहचान देती है। मिट्टी से रावण का निर्माण, पूजा-अर्चना और फिर उसे पैरों से रौंदने की रस्म के माध्यम से समाज अपनी पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहा है।

यह आयोजन केवल रावण वध तक सीमित नहीं है, बल्कि अखाड़ों की परंपरा, कुश्ती की संस्कृति और सामुदायिक आस्था से भी जुड़ा हुआ है। इसी अनूठे अंदाज में जेठी समाज हर साल विजयदशमी पर अपनी विरासत को जीवित रखता है।

ADVERTISEMENT
लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

comment पाठकों की प्रतिक्रिया (Comments)

अपनी राय दर्ज करें: