नागरिक अभिव्यक्ति । कोटा
कोटा के 133वें राष्ट्रीय दशहरा मेले में मंगलवार को हाड़ौती की रियासतकालीन परंपराएं राजसी वैभव के साथ जीवंत हो उठीं। गढ़ पैलेस में पारंपरिक दरीखाना सजने और पूजा-अर्चना के बाद भगवान लक्ष्मीनारायण जी की शाही सवारी निकाली गई। हाथी पर विराजित भगवान के दर्शन के लिए मार्ग के दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग जुटे। शोभायात्रा में रामायण के युद्ध प्रसंगों, देश के विभिन्न राज्यों के लोकनृत्यों और सैन्य बैंड की प्रस्तुतियों ने आयोजन को विशिष्ट स्वरूप दिया।
रावण दहन से पहले गढ़ पैलेस में पारंपरिक दरीखाना सजा, जिसमें हाड़ौती क्षेत्र के पूर्व ठिकानों के प्रतिनिधि पारंपरिक राजसी वेशभूषा में शामिल हुए। महापौर अनुसुइया गोस्वामी, उप महापौर विवेक राजवंशी सहित कई गणमान्य नागरिकों ने एक-दूसरे को विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए रामा-श्यामी की। इस दौरान जापान, चीन और ब्रिटेन से आए पर्यटक भी मौजूद रहे।
शुभ मुहूर्त में शाम 6:31 बजे भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी गढ़ पैलेस से रवाना हुई। भगवान हाथी पर विराजमान थे, जबकि महाराव इज्यराज सिंह खुली जीप में सवार होकर शोभायात्रा के साथ चले। सबसे आगे घुड़सवार और सेना के जवान चल रहे थे। भगवान के विमान के साथ चंवर ढुलाते सेवक भी शामिल थे। शोभायात्रा किशोरपुरा दरवाजे से होते हुए दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच पहुंची। रास्ते में खड़े लोगों ने भगवान के जयकारे लगाकर स्वागत किया।
शोभायात्रा में रामायण के प्रसंगों का सजीव चित्रण आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा। प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता, सुग्रीव, अंगद, विभीषण, नल-नील, जामवंत और हनुमान सहित विभिन्न पात्रों के साथ रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के रूप में कलाकार शामिल हुए। वानर सेना और रावण की सेना के बीच युद्ध का मंचन, रावण-जटायु संघर्ष तथा खप्पर लिए असुरों का संहार करती मां कालिका का रौद्र रूप देखने के लिए लोग ठहर गए। ऊंटगाड़ी पर बजते युद्ध के नगाड़ों, ढोल-ताशों और रामधुनी के बीच तलवारबाजी करते वानर सेना के कलाकारों ने वातावरण को उत्साहपूर्ण बना दिया।
देश के विभिन्न राज्यों से आए लोक कलाकारों ने भी सांस्कृतिक छटा बिखेरी। राजस्थान के कच्ची घोड़ी नृत्य, कजरी नृत्य तथा उदयपुर क्षेत्र की भील और सहरिया जनजातियों की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहीं। अरुणाचल प्रदेश का टप्पू युद्ध नृत्य, पश्चिम बंगाल का छाऊ नृत्य और केरल का कुम्माटी लोकनृत्य भी प्रस्तुत किया गया। आर्मी बैंड और पुलिस बैंड की धुनों के साथ महिलाओं के मंगल गीतों ने शोभायात्रा की पारंपरिक गरिमा बढ़ाई। राजसी रस्मों, धार्मिक आस्था और देश की विविध लोक संस्कृतियों के संगम ने कोटा दशहरा मेले की ऐतिहासिक पहचान को एक बार फिर सामने रखा।
