नागरिक अभिव्यक्ति । कोटा
कोटा के 133वें राष्ट्रीय दशहरा मेले में मंगलवार को श्रीराम रंगमंच पर राघवेंद्र कला संस्थान के कलाकारों ने रामलीला के अंतिम प्रसंगों का सजीव मंचन किया। कुंभकर्ण, मेघनाद और रावण वध से लेकर विभीषण के राजतिलक और भगवान श्रीराम के अयोध्या प्रस्थान तक के दृश्यों ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। मंचन के दौरान धर्म की विजय, अहंकार के अंत और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।
रामलीला की शुरुआत लंकापति रावण द्वारा कुंभकर्ण को निद्रा से जगाकर युद्धभूमि में भेजने के प्रसंग से हुई। इसके बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के बाणों से कुंभकर्ण तथा मेघनाद के वध का मंचन किया गया। कलाकारों ने संवाद, अभिनय और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से युद्ध के दृश्यों को जीवंत बनाया। राम-रावण के बीच हुए अंतिम युद्ध के दौरान भगवान श्रीराम के अग्निबाण से रावण वध का दृश्य प्रस्तुत किया गया तो श्रीराम रंगमंच परिसर जय श्रीराम और सत्यमेव जयते के जयकारों से गूंज उठा। प्रकाश व्यवस्था, पार्श्व संगीत और ध्वनि प्रभावों ने मंचन को और प्रभावशाली
बनाया।
रावण वध के बाद भगवान श्रीराम ने विभीषण का लंका के राजा के रूप में राजतिलक किया। इसके बाद माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान और वानर सेना के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान का दृश्य मंचित हुआ। अयोध्या में दीप जलाकर श्रीराम के स्वागत का प्रसंग चौपाइयों और भजनों के साथ प्रस्तुत किया गया। इस दृश्य ने दर्शकों को राम के वनवास से लौटने और अयोध्या में दीपोत्सव की परंपरा की याद दिलाई। राष्ट्रीय दशहरा मेले की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में रामलीला का यह मंचन धार्मिक आस्था के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और रामायण के आदर्शों को सामने लाने वाला रहा।
