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शाम ढलते ही रोशनी, रोमांच, जायके से सजता है मेला

अभिव्यक्ति स्पेशल | 133वें राष्ट्रीय दशहरा मेले में 70 से ज्यादा झूलों, बाजारों और सांस्कृतिक आयोजनों की धूम; धनतेरस तक जुटेगी भीड़

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125 फीट की विशाल नाव, मिक्सर और ब्रेक डांस के रोमांचक झूले, मौत के कुएं के हैरतअंगेज करतब और चारों तरफ जगमगाती रोशनी… कोटा का दशहरा मेला पूरे शबाब पर हैं। 45 साल पुराने शेरे पंजाब के फालूदा, नसीराबाद के मशहूर कचौरे, पन्नालाल के पकोड़े और शंभू की दूध-जलेबी का स्वाद लेना हो या खिलौनों, कपड़ों और बर्तनों की खरीदारी करनी हो, यहां हर उम्र के लिए कुछ खास है। करीब 300 साल पुरानी परंपरा से जुड़े इस मेले में परिवार और दोस्तों के साथ घूमने का अपना ही मजा है। मेला रावण दहन के साथ शुरू हो चुका है और धनतेरस तक चलेगा। तो फिर इंतजार कैसा, आप कोटा दशहरा मेला घूमने कब आ रहे हैं?

नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा

आसमान की ओर उठती विशाल नाव, तेज रफ्तार में घूमते मिक्सर और ब्रेक डांस झूले, मौत के कुएं में हैरतअंगेज करतब और हवा में गूंजती लोगों की रोमांच भरी आवाजें… कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला अब अपनी रंगत पकड़ चुका है। 20 अक्टूबर को रावण दहन के साथ शुरू हुआ करीब 300 साल पुरानी परंपरा से जुड़ा यह मेला धनतेरस तक कोटा और हाड़ौती समेत पूरे प्रदेशवासियों के लिए मनोरंजन, खरीदारी और स्वाद का सबसे बड़ा ठिकाना बना रहेगा। दशहरा मैदान में सजी झूला नगरी में बच्चों की चकरियों से लेकर युवाओं को चुनौती देने वाले रोमांचक झूलों तक हर उम्र के लिए कुछ न कुछ है। करीब 125 फीट की विशाल नाव, मिक्सर, जाइंट व्हील, सुनामी और ब्रेक डांस जैसे आकर्षणों के बीच 45 साल पुराने शेरे पंजाब के फालूदा, नसीराबाद के कचौरे और रामपुरा की दूध-जलेबी का स्वाद भी लोगों को खींच रहा है। खिलौना, कपड़ा, बर्तन और हलवाई बाजार की चहल-पहल के साथ मेला अब उस दौर में पहुंच रहा है, जब शाम ढलते ही रोशनी, रफ्तार और जायके मिलकर पूरे दशहरा मैदान को उत्सव में बदल देते हैं।

बैलगाड़ियों से आधुनिक झूलों तक… 45 साल के सफर के गवाह

मेले ने समय के साथ मनोरंजन की दुनिया में लंबा सफर तय किया है। करीब चार दशक पहले तक लोग बैलगाड़ियों में बैठकर दशहरा मैदान पहुंचते थे। उस दौर में मनोरंजन के साधन सीमित थे, लेकिन मेले को लेकर लोगों का उत्साह कम नहीं था। समय बदला, शहर का विस्तार हुआ और मेले की झूला नगरी भी आधुनिक होती चली गई। अब करीब 125 फीट की विशाल नाव, मिक्सर, जाइंट व्हील, सुनामी और ब्रेक डांस जैसे झूले लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। हर साल लोगों की पसंद और मांग के अनुसार झूलों में नए प्रयोग किए जा रहे हैं।

पिछले साल मिक्सर झूले को मिले अच्छे प्रतिसाद के बाद इस बार इसकी तीन से चार यूनिट तक संचालित की जा रही हैं। यह बदलाव बताता है कि मेले में आने वाले लोग अब केवल घूमने-फिरने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रोमांच के नए अनुभव भी तलाशते हैं। झूला संचालकों के लिए नए आकर्षण जोड़ना और पुराने झूलों को बेहतर बनाना कारोबार का अहम हिस्सा बन गया है। बैलगाड़ियों से शुरू हुआ सफर अब आधुनिक एडवेंचर राइड्स तक पहुंच चुका है झूलों की रफ्तार के बीच मेले का एक और संसार है, जहां स्वाद लोगों को रोक लेता है। शेरे पंजाब आइसक्रीम का फालूदा, नसीराबाद का अग्रवाल कचौरा भंडार और पन्नालाल के पकोड़े उन पारंपरिक स्वादों में शामिल हैं, जिनका अपना अलग आकर्षण है। शेरे पंजाब आइसक्रीम के सरदार तरनपाल सिंह के अनुसार, उनका प्रतिष्ठान करीब 40 से 45 साल से मेले में आ रहा है। कोटावासियों के बीच उनके स्पेशल फालूदा की पहचान पुरानी है। मेले में आने वाले कई लोगों के लिए झूले और खरीदारी के साथ फालूदा खाना भी घूमने के अनुभव का हिस्सा बन चुका है।

वर्षों से मौजूद ऐसे प्रतिष्ठान स्वाद के साथ यादों को भी जीवित रखते हैं। नसीराबाद का मशहूर अग्रवाल कचौरा भंडार वर्ष 1995 से लगातार मेले में आ रहा है। मसालेदार स्वाद और कुरकुरी परत वाले कचौरे के शौकीनों के लिए यह एक खास पड़ाव है। पन्नालाल के पकोड़ों और आइसक्रीम के दिवाने अलग ही नजर आते हैं। वहीं, 2026 से पहली बार रामपुरा की करीब 70 साल पुरानी शम्भू जी की दुकान से जुड़ी दूध-जलेबी और लस्सी भी खानपान के बाजार की रौनक बढ़ाने वाली हैं। मेले में खाने-पीने का आनंद सिर्फ भूख मिटाने तक सीमित नहीं रहता। झूला झूलने के बाद परिवार के साथ कुछ खाने बैठना, दोस्तों के साथ नाश्ता करना या पसंदीदा मिठाई का स्वाद लेना मेले की यादों का हिस्सा बन जाता है। यही वजह है कि पुराने खानपान प्रतिष्ठानों की मौजूदगी मेले की पहचान को मजबूत करती है।

125 फीट की नाव से मौत के कुएं तक, भरपूर रोमांच

इस बार करीब 125 फीट की विशाल नाव खास आकर्षण है। नाव के एक छोर से दूसरे छोर तक झूलने का रोमांच इसमें बैठे लोगों के साथ नीचे खड़े दर्शकों को भी आकर्षित करता है। जाइंट व्हील, सुनामी, ब्रेक डांस और मिक्सर जैसे झूले भी मेले में रफ्तार और ऊंचाई का रोमांच जोड़ रहे हैं। 26 और 28 सीटर झूलों के साथ बच्चों के लिए ड्रैगन ट्रेन, टॉय ट्रेन और चकरियां भी हैं। 70 से अधिक तरह के झूलों वाली झूला नगरी हर उम्र के लोगों को आकर्षित कर रही है। मौत का कुआं भी खास आकर्षण है। गोलाकार संरचना के भीतर मोटरसाइकिल और अन्य निर्धारित वाहनों पर करतब दिखाते कलाकार अपनी गति और संतुलन से दर्शकों की सांसें थाम देते हैं। हालांकि, रोमांच तभी सुरक्षित है, जब तकनीकी जांच, संचालन की अनुमति और सुरक्षा मानकों का पालन हो। मेले में पानी और बिजली जैसी सुविधाओं में सुधार से झूला संचालकों को राहत मिली है।

खरीदारी का मौका

खिलौनों से बर्तनों तक बाजार, खरीदारी का मौका

दशहरा मैदान में झूलों और खानपान के साथ खरीदारी के बाजार भी मेले को पूरे परिवार के लिए खास बनाते हैं। हलवाई बाजार के अलावा खिलौना, कपड़ा और घरेलू बर्तनों की दुकानें लोगों को अपनी ओर खींचती हैं। रंग-बिरंगे खिलौनों के सामने बच्चों की पसंद और जिद दिखाई देती है, तो कपड़े और बर्तनों की दुकानों पर घरेलू जरूरतों के लिए खरीदारी करने वाले लोग नजर आते हैं। लोग झूले झूलने और खानपान का आनंद लेने के साथ सामान देखते हैं, कीमतों की तुलना करते हैं और अपनी पसंद की चीजें खरीदते हैं। दुकानदारों, छोटे व्यापारियों, सप्लायरों और अस्थायी कामगारों के लिए भी मेला कारोबार का बड़ा अवसर लेकर आता है।

300 साल की विरासत

हर पीढ़ी के लिए नया आकर्षण, सबकी अपनी कहानी

कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला करीब 300 साल पुरानी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा माना जाता है। रियासतकाल से चली आ रही दशहरा उत्सव की परंपरा समय के साथ विशाल मेले के रूप में विकसित हुई। रावण दहन और धार्मिक आस्था के साथ इसमें लोक संस्कृति, बाजार, खानपान और आधुनिक मनोरंजन के आकर्षण जुड़ते गए। मेले की खासियत यह है कि हर पीढ़ी यहां अपने लिए कुछ न कुछ तलाश लेती है। बुजुर्गों के लिए पुरानी परंपराओं और स्वादों की यादें हैं, बच्चों के लिए खिलौने और चकरियां, युवाओं के लिए तेज रफ्तार झूले और परिवारों के लिए खरीदारी तथा साथ बिताने का मौका। बैलगाड़ियों के दौर से आधुनिक झूला नगरी तक का सफर इसी बदलते मेले की कहानी है।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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