नागरिक अभिव्यक्ति । कोटा
कोटा के 133वें राष्ट्रीय दशहरा मेले में मंगलवार, 20 अक्टूबर को रियासतकालीन परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच रावण दहन हुआ। दशहरा मैदान स्थित विजयश्री रंगमंच के सामने बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक रावण का विशाल पुतला धू-धू कर जला तो पूरा मैदान जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा। इस ऐतिहासिक आयोजन को देखने के लिए शहर के साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और दूसरे प्रदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। रावण दहन ने कोटा की सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को एक बार फिर जीवंत कर दिया।
कोटा रियासत के पूर्व महाराव इज्यराज सिंह ने मैदान में विधि-विधान से ज्वारा पूजन और श्री सीताजी के पाने का विशेष पूजन किया। धार्मिक अनुष्ठान पूरे होने के बाद उन्होंने परंपरा के अनुसार रावण की नाभि में स्थित अमृत कलश पर तीर चलाकर उसे भेदा। इसके साथ ही रावण के कुनबे के दहन की शुरुआत हुई। आयोजन में परंपरा और आधुनिक तकनीक का संगम भी देखने को मिला। पुतलों के दहन के दौरान आतिशबाजी ने दर्शकों को रोमांचित किया, वहीं रावण के पुतले में ग्रीन आतिशबाजी का प्रयोग किया गया।
तय मुहूर्त के अनुसार रात 8 बजकर 24 मिनट पर कुंभकर्ण के पुतले में आग लगाई गई। करीब छह मिनट तक पुतले के विभिन्न हिस्सों में आतिशी गतिविधियां होती रहीं। रात 8:30 बजे मेघनाद के पुतले की तलवार में आग दिखाई दी। इसके बाद रात 8:34 बजे 105 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन शुरू हुआ। इस बार कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों की ऊंचाई 72-72 फीट रखी गई थी। रावण की तलवार और ढाल में आग लगने के बाद नाभि चक्र घूमता दिखाई दिया तो दर्शकों ने जय श्रीराम के नारे लगाए। रात 8:38 बजे तक रावण के सिर एक-एक कर फूटने लगे और कुछ ही मिनटों में विशाल पुतला जलकर राख हो गया।
रावण की छतरी, मुकुट, नक्काशी, ढाल और कंधों में हुए आतिशी धमाकों ने दर्शकों का ध्यान खींचा। इससे पहले वानर सेना ने हनुमान चालीसा का पाठ किया। मेला परिसर में श्रीराम रंगमंच से करीब 45 मिनट तक रंगीन आतिशबाजी हुई। आसमान में रंग-बिरंगी रोशनी और पटाखों की गूंज के बीच दशहरा मैदान जगमगा उठा। दर्शक इस दृश्य को मोबाइल कैमरों में कैद करते नजर आए। सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बीच आयोजन उत्साह और उल्लास के साथ संपन्न हुआ।
रियासतकालीन धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर विशाल पुतलों के दहन और रंगीन आतिशबाजी तक, कोटा का दशहरा मेला अपनी विशिष्ट पहचान के साथ लोगों को आकर्षित करता रहा। इस बार ग्रीन आतिशबाजी के इस्तेमाल को पर्यावरण के लिहाज से अहम पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया। हालांकि, इसे पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त बताने के बजाय आतिशबाजी से होने वाले धुएं और ध्वनि के प्रभाव को ध्यान में रखना जरूरी है।
