नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा
भारतवर्ष में कुल्लू की मिठास और मैसूर के राजसी ठाट के साथ यदि किसी तीसरे दशहरा पर्व की पूरे देश में धाक है, तो वह है कोटा का ऐतिहासिक राष्ट्रीय दशहरा मेला। कोटा का दशहरा जितना रंग-बिरंगा और जीवंत है, इसकी परंपराएं भी उतनी ही प्राचीन व गौरवशाली हैं।
मध्यकाल में महज तीन दिनों तक सिमटा रहने वाला यह धार्मिक उत्सव आज समय के साथ अपना स्वरूप बदलकर 22 से 25 दिनों तक चलने वाले एक विशाल राष्ट्रीय मेले में तब्दील हो चुका है। कोटा राज्य के इतिहास में विजयादशमी के धार्मिक आयोजनों की नींव मध्यकालीन हाड़ा शासक महाराव दुर्जनशाल सिंह (1723-1756 ई.) ने रखी थी। उन्होंने मंदिरों में पूजन-अर्चन के साथ-साथ राजसी लवाजमे वाली सवारियां और 'दरीखाने' की उत्सव-परंपराएं शुरू कराईं, जिसे आगे के हाड़ा शासकों ने पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया।
1892 में शुरू हुई परंपरा, अब 133वां महाकुंभ
शहर में रावण वध की परंपरा तो कोटा की स्थापना के समय से ही रही है, लेकिन वर्ष 1892 में महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के शासनकाल में इसे औपचारिक मेले का रूप दिया गया। अब मेले का शुभारंभ नवरात्र स्थापना पर होता है और समापन धनतेरस से ठीक एक दिन पहले। आज भी पूर्व राजपरिवार और नगर निगम मिलकर इस राजसी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। विजयादशमी की शाम रावण वध के लिए गढ़ पैलेस से पारंपरिक लवाजमे के साथ शाही सवारी निकलती है। आधुनिक दौर में कोटा के दशहरा मैदान को दिल्ली के प्रगति मैदान की तर्ज पर विश्वस्तरीय स्वरूप में विकसित किया जा चुका है। इस बार वर्ष 2026 में 133वां मेला भरेगा।
रावण का सिर होता था 80 मन का
इतिहासकारों की माने तो पहले दशहरा मैदान में कुछ स्थायी ढांचे बने हुए थे, जिन पर रावण व उनके परिवार के अन्य सदस्यों के सिर बनाकर रखे जाते थे। रावण के सिर का वजन 80 मन होता था, अन्य सदस्यों के सिर का वजन 25-25 मन होता था। इन सिरों को हाथी या मशीन के माध्यम से खींच कर गिराया जाता था, जिसे रावण वध की संज्ञा दी जाती थी।
कोरोना की वजह से 6 साल पहले लगा था विराम
वर्ष 1932 की भीषण बाढ़ हो या 1971 का भारत-पाक युद्ध दोनों ही समय आपदाओं के बावजूद मेला बदस्तूर भरा। 1971 में ब्लैकआउट के कारण मेला दिन में आयोजित किया गया था। केवल 6 साल पहले कोरोना महामारी के दौरान इतिहास में पहली बार मेले पर विराम लगा था।
