कोटा | डिजिटल डेस्क
कोटा का गौरवशाली इतिहास और उसकी सांस्कृतिक विरासत एक बार फिर जीवंत होने जा रही है। कभी रियासतकालीन भव्य आयोजनों और मशक बैंड (बैगपाइपर) की गूंजती सुरीली धुनों का साक्षी रहा श्री उम्मेद क्लब का करीब 128 साल पुराना ऐतिहासिक 'बैंड स्टैंड' अब अपनी खोई हुई पहचान वापस पाने जा रहा है। पिछले करीब 76 वर्षों से उपेक्षित और बदहाली का शिकार रही इस अनमोल धरोहर को श्री उम्मेद क्लब प्रबंधन, INTACH और कोटा हेरिटेज वॉक के साझा प्रयासों से पुनर्जीवित किया गया है। सात दशक से पसरे सन्नाटे को तोड़ते हुए आजादी की पूर्व संध्या पर यहाँ हाड़ौती के स्थानीय कलाकारों और भारतीय सेना के आर्मी बैंड की शानदार प्रस्तुतियां आयोजित की जाएंगी।
कचरे के ढेर से ऐतिहासिक पहचान तक का सफर
श्री उम्मेद क्लब के महासचिव लोकेन्द्र सिंह राजावत ने बताया कि क्लब परिसर के एक कोने में स्थित यह विशाल चबूतरा दशकों से अपनी मूल पहचान खो चुका था। देखरेख के अभाव में इसकी हालत इतनी जर्जर हो गई थी कि आसपास के लोग इसे महज एक टूटी-फूटी बावड़ी या पुरानी इमारत का खंडहर समझकर यहाँ कचरा डालने लगे थे।
हालाँकि, जब कोटा हेरिटेज वॉक, INTACH (इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज) और शहर के प्रमुख इतिहासकारों ने क्लब के पुराने अभिलेखों और ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल की, तो यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि यह कोई साधारण ढांचा नहीं, बल्कि रियासतकाल का वह खास 'बैंड स्टैंड' है, जहाँ कभी राजसी मेहमानों के स्वागत में शाही बैंड की धुनें बजा करती थीं।
1896 के राजसी इतिहास और सम्मान से जुड़ी जड़ें
इस ऐतिहासिक स्थल की कहानी वर्ष 1896 से शुरू होती है। उस दौर में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने कोटा के महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय को शासन संचालन के पूर्ण अधिकार सौंपे थे। महारानी का यह शाही फरमान लेकर राजपूताना के तत्कालीन ए.जी.जी. (एजेंट टू गवर्नर जनरल) सर रॉबर्ट क्रॉस्थवेट खुद कोटा आए थे।
इस ऐतिहासिक अवसर को यादगार बनाने के लिए महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय ने 5 दिसंबर 1896 को कोटा गढ़ में एक भव्य जलसा आयोजित किया। इसके साथ ही, सर क्रॉस्थवेट के सम्मान में कोटा के बाग क्षेत्र में एक भव्य भवन बनाने का निर्णय लिया गया, जिसका नाम 'क्रॉस्थवेट इंस्टीट्यूट' (वर्तमान में श्री उम्मेद क्लब) रखा गया। इस भवन की आधारशिला 26 जनवरी 1898 को स्वयं सर क्रॉस्थवेट ने रखी थी।
इंजीनियर टिकेल का डिजाइन और 'बीन बाजा भवन' की परंपरा
इस पूरे परिसर और भवन का वास्तुशिल्प डिजाइन कोटा रियासत के प्रसिद्ध स्टेट इंजीनियर आर.एच. टिकेल ने तैयार किया था। इसी डिजाइन के तहत भवन के पास एक खुले और कलात्मक चबूतरे के रूप में 'बैंड स्टैंड' का निर्माण कराया गया।
रियासतकाल में बैंड मास्टर का आधिकारिक निवास और कार्यालय लाडपुरा दरवाजे के समीप स्थित था, जिसे स्थानीय लोग ‘बीन बाजा भवन’ कहते थे। जब भी महाराव अपने वरिष्ठ अधिकारियों और जागीरदारों के साथ क्रॉस्थवेट इंस्टीट्यूट (जिसे उस दौर में ‘यादघर’ भी कहा जाता था) में पधारते थे, तो बैगपाइपर और मशक बाजे की धुनें पूरे वातावरण को राजसी गरिमा और उत्साह से भर देती थीं।
हेरिटेज पर्यटन और नई पीढ़ी को जोड़ने की अनूठी पहल
उम्मेद क्लब प्रबंधन की इस सराहनीय पहल को शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और इतिहासकारों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। क्लब के पदाधिकारियों का मानना है कि इसे संवारने के बाद अब यह स्थल कोटा आने वाले देसी-विदेशी पर्यटकों के लिए भी एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र बनेगा।
इतिहासविद फ़िरोज़ अहमद, कोटा हेरिटेज वॉक के सर्वेश सिंह, INTACH कोटा के कन्वीनर निखिलेश सेठी, क्लब उपाध्यक्ष अजय खत्री सहित आर.डी. मीणा, डॉ. विजय सरदाना, मनीष धारीवाल, सुधाकर बहेड़िया, कपिल जैन, अलौकिक जैन, कमल दीप, कुलदीप माथुर, कपिल अरोड़ा और गगन जैन ने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सभी का एकमत से मानना है कि ऐतिहासिक विरासतों को केवल पत्थरों के ढांचे के रूप में नहीं, बल्कि शहर की जीवंत संस्कृति के रूप में नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
