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आहार से आचरण तक हर कदम पर संयम जरूरी : नंदीषेण मुनि

अधिक भोजन से बचें, जीवदया और अहिंसा को जीवन में उतारें; जितना अच्छा पाना है, उतना पहले स्वयं को अच्छा बनाएं : जितेंद्र मुनि

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नागरिक अभिव्यक्ति । कोटा

कोटा। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा में चल रहे नियमित प्रवचनों के दौरान सोमवार को धर्मसभा में नंदीषेण मुनि म.सा. ने आहार, संयम और जीवदया के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को आहार से लेकर दैनिक जीवन के प्रत्येक कार्य में सावधानी और संयम रखना चाहिए। आवश्यकता से अधिक भोजन करने के बजाय शरीर की क्षमता और जरूरत के अनुसार ही आहार ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि समस्त रोगों का मूल अजीर्ण माना गया है, इसलिए खान-पान में सजगता जरूरी है।

मुनिश्री ने साधु जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि साधु को उतना ही आहार ग्रहण करना चाहिए, जितना शरीर के लिए आवश्यक हो। आवश्यकता से अधिक आहार लेना उचित नहीं है। संयमी जीवन में आहार शरीर को बनाए रखने का साधन है, भोग का माध्यम नहीं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक कदम पर जीवों की विराधना से बचने का प्रयास होना चाहिए। जैन दर्शन में अहिंसा और जीवदया को विशेष महत्व दिया गया है। कर्म सिद्धांत की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि असंयम और त्याग की भावना के अभाव में जीव गंभीर कर्म बंध का कारण बनता है। इच्छाओं पर नियंत्रण, संयम और आत्मनिरीक्षण व्यक्ति को आत्मकल्याण की दिशा में आगे ले जाते हैं।

श्री जितेंद्र मुनि म.सा. ने गुरु सेवा, रिश्तों और पारिवारिक संस्कारों पर विचार रखते हुए कहा कि संबंध केवल औपचारिकता से नहीं, बल्कि विश्वास, अच्छे भाव और समर्पण से मजबूत होते हैं। उन्होंने कहा कि किसी को अच्छा समझना आसान है, लेकिन जीवनभर संबंध निभाना वास्तविक परीक्षा है। गुरु सेवा में स्वार्थ नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण का भाव होना चाहिए। स्वार्थवश की गई सेवा अपने वास्तविक अर्थ को खो देती है।

मुनिश्री ने कहा कि सत्कार से इनकार करना व्यक्ति के जीवन की सबसे बड़ी गरीबी है। भौतिक संपत्ति के बावजूद यदि दूसरों के प्रति सम्मान और आदर का भाव नहीं है तो जीवन को समृद्ध नहीं कहा जा सकता। उन्होंने तप को आत्मशुद्धि और शांति का माध्यम बताते हुए क्षमता के अनुसार नियमित रूप से तप करने की प्रेरणा दी। साथ ही कहा कि अच्छा पाना है तो शुरुआत स्वयं को अच्छा बनाने से करनी होगी।

उन्होंने परिवार में छोटों के मान और बड़ों के सम्मान को आवश्यक बताते हुए कहा कि प्रेम, आदर और एक-दूसरे की भावनाओं को समझने से रिश्तों में मजबूती आती है। आचार्य श्री हीरा गुरु के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संसार छोड़ना सरल है, लेकिन अपनी प्रकृति को बदलना कठिन है। संघ अध्यक्ष पंकज मेहता ने नियमित प्रवचनों को सभी के लिए कल्याणकारी बताया। मंत्री अनिल दक ने श्रावकों से समय पर पहुंचकर प्रवचनों का लाभ लेने का आह्वान किया।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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