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विवेक और दूरदर्शिता श्रावक के जीवन के महत्वपूर्ण गुण : योगेश मुनि

सही निर्णय लेने के लिए परिणामों पर विचार जरूरी, तप-त्याग और सेवा से मिलती है आत्मशुद्धि व शांति

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विवेक और दूरदर्शिता श्रावक के जीवन के महत्वपूर्ण गुण : योगेश मुनि
विवेक और दूरदर्शिता श्रावक के जीवन के महत्वपूर्ण गुण : योगेश मुनि
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कोटा | नागरिक अभिव्यक्ति। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा में आयोजित नियमित प्रवचन में योगेश मुनि जी म.सा. ने विवेक और दूरदर्शिता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विवेक का अभाव संबंधों में कड़वाहट पैदा करता है। जब व्यक्ति सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता खोने लगता है, तो छोटी-छोटी बातें भी विवाद का कारण बन जाती हैं। इसलिए प्रत्येक कार्य करने और किसी बात पर प्रतिक्रिया देने से पहले उसके परिणामों पर विचार करना आवश्यक है।

निर्णय लेने से पहले परिणामों पर विचार करें

योगेश मुनि जी ने कहा कि दूरदर्शी श्रावक किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले उसके संभावित परिणामों पर विचार करता है। वह वर्तमान में लिए जाने वाले निर्णयों के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों को समझता है। भगवान ने वर्तमान में जीने की प्रेरणा दी है, लेकिन इसका अर्थ भविष्य की संभावनाओं की अनदेखी करना नहीं है। वर्तमान को सार्थक बनाते हुए आने वाले समय के परिणामों का ध्यान रखना भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि विवेक और दूरदर्शिता के साथ कार्य करने वाला व्यक्ति अपने समय, सामर्थ्य और संसाधनों का बेहतर उपयोग कर पाता है। इससे गलतियों और बाद में होने वाले पश्चाताप की आशंका कम होती है। उन्होंने श्रावकों को लोभ और क्रोध से दूर रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि आवेश में लिया गया निर्णय परेशानी का कारण बन सकता है।

वस्तुओं के बजाय अंतरात्मा को समझने का प्रयास करें : जितेंद्र मुनि

जितेंद्र मुनि जी म.सा. ने धर्म, तप, त्याग, सेवा, विवेक और दूरदर्शिता के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन में प्राप्त वस्तुओं और अवसरों का सदुपयोग करना चाहिए। तप से शक्ति बढ़ती है, सेवा से आत्मशुद्धि होती है और त्याग से मन को शांति मिलती है। वहीं विवेक और दूरदर्शिता सही निर्णय लेने में सहायक होते हैं।

मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य अक्सर बाहरी वस्तुओं और सांसारिक सुविधाओं को महत्व देता है, जबकि अपनी अंतरात्मा को समझने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कम करता है। जीवन की वास्तविक सार्थकता बाहरी आकर्षणों में उलझने के बजाय आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि में है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि तप केवल शारीरिक कष्ट सहने का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, विकारों और कमजोरियों पर नियंत्रण पाने का मार्ग भी है। ममता, अज्ञान और मिथ्यात्व को दुख के प्रमुख कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर व्यक्ति दुखी होता है। संसार की वस्तुओं को स्थायी मानकर उनसे अत्यधिक मोह बढ़ाने के बजाय उनके उचित उपयोग की भावना विकसित करनी चाहिए।

संसाधनों का सदुपयोग करने का संदेश

संघ अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि ममता, अज्ञान और मिथ्यात्व से दूर रहकर जीवन में प्राप्त संसाधनों का सदुपयोग करना चाहिए। संघ मंत्री अनिल दक ने कहा कि विवेक और दूरदर्शिता को जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा देने वाले इन प्रवचनों से श्रावक लाभान्वित हुए।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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