नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा
पूरे देश को डॉक्टर देने वाली शिक्षा नगरी कोटा के सरकारी अस्पताल जीवन देने के केंद्र बनने के बजाय प्रसूताओं की जान ले रहे हैं। मई से अक्टूबर 2026 के बीच न्यू मेडिकल कॉलेज और जेके लोन अस्पतालों में एक-एक कर 10 प्रसूताओं की मौत ने पूरे चिकित्सा तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मई में 5, अगस्त में 3 और अब अक्टूबर के दो दिनों (16-17) में 2 और महिलाओं ने दम तोड़ दिया। सबसे बड़ा सवाल यही है कि बार-बार सामने आ रहे इन मामलों के बाद व्यवस्था में ऐसा क्या बदलाव हो, जिससे प्रसूताओं की जान सुरक्षित रह सके? इस बीच अस्पताल के आईसीयू और सेंट्रल ड्रग स्टोर से 12 तरह की दवाओं के 14 नमूने लिए गए हैं। संबंधित बैच की राजस्थान में सप्लाई रोकने और उनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध की कार्रवाई की गई है। मई में 5 मौतों के बाद भी ऐसा ही हुआ था। हंगामे और परिजनों के आक्रोश को दबाने के लिए जांच कमेटियों का झुनझुना बजा, कुछ डॉक्टरों को बलि का बकरा बनाकर सस्पेंड किया गया और अंत में सबको 'क्लीनचिट' का तमगा पहनाकर वापस कुर्सी पर बैठा दिया गया। लेकिन, सिस्टम में न पहले सुधार दिखा और न अब। मौतों का सिलसिला फिर शुरू हो गया है, क्योंकि सिर्फ डॉक्टरों को निलंबित करने से मौतें नहीं रुकतीं; सिस्टम में मौजूद बुनियादी कमियों को दूर करना होगा।
'क्लीनचिट' तो मौतें किसकी लापरवाही से हुईं?
मई 2026 में जब पायल, ज्योति, पिंकी महावर, प्रिया और शिरीन की एक के बाद एक मौत हुई और किडनी फेल होने के मामले सामने आए, तो कोहराम मच गया था। दबाव में सरकार ने प्रोफेसर डॉ. बीएल पाटीदार, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. खुशबू मीणा और सर्जरी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नवनीत कुमार को सस्पेंड कर दिया। लोकल टीम से लेकर जयपुर, जोधपुर और देश के प्रतिष्ठित संस्थान एम्स की टीमें जांच के लिए कोटा पहुंचीं। एनएचएम ने भी अपनी जांच बैठाई। महीनों चली इन चार उच्चस्तरीय जांचों ने अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि डॉक्टरों की कोई 'व्यक्तिगत लापरवाही' नहीं थी। बस फिर क्या था, चिकित्सा शिक्षा विभाग की संयुक्त सचिव डॉ. ज्योति चौहान ने आदेश जारी किए और तीनों निलंबित डॉक्टरों को ससम्मान उसी मेडिकल कॉलेज में दोबारा पदस्थापित कर दिया गया। लेकिन मौतें क्यों हुईं, इसका साफ कारण किसी जांच रिपोर्ट ने नहीं बताया।
14 संदिग्ध सैंपल, रिपोर्ट पर टिकी नजरें
अक्टूबर आते-आते यह खौफनाक सिलसिला फिर सामने आया। न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 16 और 17 अक्टूबर को रेशमा खान (40) और रोशन बाई (30) की सिजेरियन डिलीवरी के बाद मौत हो गई। एक अन्य प्रसूता की किडनी जवाब दे चुकी है और उसकी हालत गंभीर बनी हुई है। इस बार जब मामला तूल पकड़ा, तो सहायक औषधि नियंत्रक प्रहलाद मीणा की टीम ने अस्पताल के आईसीयू और सेंट्रल ड्रग स्टोर से 12 तरह की 14 दवाइयों और फ्लूइड्स के नमूने जब्त किए। प्रशासन ने इन सभी दवाओं के संबंधित बैच की सप्लाई पूरे राजस्थान में प्रतिबंधित कर दी है। परिजनों का गंभीर आरोप है कि ऑपरेशन के बाद मरीज बिल्कुल ठीक थीं, लेकिन एक खास इंजेक्शन या दवा लगते ही शरीर सुन्न हो गया और सांसें उखड़ने लगीं।
