कोटा। नगर निगम चुनाव में पुराने चेहरों के टिकट काटकर नए प्रत्याशियों पर भरोसा जताने का फैसला भाजपा और कांग्रेस के लिए कई वार्डों में नुकसान का सौदा साबित हुआ। कहीं नए प्रत्याशी मतदाताओं का भरोसा नहीं जीत सके तो कहीं टिकट से वंचित दावेदारों ने निर्दलीय चुनाव लड़कर पार्टी के समीकरण बिगाड़ दिए। हालांकि वार्ड 34 में भाजपा का चेहरा बदलने का प्रयोग सफल रहा।
वार्ड 34 में भाजपा ने राममोहन मित्रा का टिकट काटकर सुरेंद्र गुप्ता को मैदान में उतारा था। गुप्ता ने 1482 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। इसके विपरीत कांग्रेस को वार्ड 88, 24 और 91 में नए चेहरों पर लगाया दांव भारी पड़ा।
तीन वार्डों में कांग्रेस को झटका
वार्ड 88 में कांग्रेस ने महिला कांग्रेस जिलाध्यक्ष शालिनी गौतम का टिकट काटकर प्रांजलि गौतम को प्रत्याशी बनाया। यहां भाजपा की मंजू देवी ने 506 वोटों से जीत दर्ज की। वार्ड 24 में पूर्व डिप्टी मेयर पवन मीणा की जगह रामावतार मीणा को टिकट दिया गया। उन्हें भाजपा के भंवरलाल मीणा ने 194 वोटों से हराया।
वार्ड 91 में कांग्रेस ने एनएसयूआई जिलाध्यक्ष विशाल मेवाड़ा की जगह संजय यादव को मैदान में उतारा। यहां भाजपा के गोपालराम मांडा ने 899 वोटों के अंतर से जीत हासिल की। इन नतीजों ने कांग्रेस के प्रत्याशी चयन और स्थानीय समीकरणों के आकलन पर सवाल खड़े किए हैं।
टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय जीतकर दिया जवाब
वार्ड 71 में भाजपा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष अजय चौधरी की पत्नी वंदना फौजदार को टिकट नहीं मिला। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और करीब 160 वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर भाजपा को झटका दिया। उनकी जीत ने दिखाया कि स्थानीय चुनाव में प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ भी निर्णायक हो सकती है।
वार्ड 77 में रानी जुबेर, वार्ड 49 में कौशल किशोर शर्मा और वार्ड 72 में भी टिकट वितरण के बाद उभरी नाराजगी और बदले समीकरण चर्चा में रहे।
सिर्फ चेहरा बदलने से नहीं बनी बात
इन नतीजों से स्पष्ट है कि नए चेहरे उतारना अपने आप में जीत की गारंटी नहीं है। पुराने दावेदारों की नाराजगी दूर करना, कार्यकर्ताओं को साथ रखना और स्थानीय जनाधार का सही आकलन भी जरूरी है। हालांकि हार के लिए केवल टिकट बदलने को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा; हर वार्ड में मुकाबले और समीकरण अलग रहे।
संपादकीय नोट: उपलब्ध विवरण में आठों सीटों के स्पष्ट परिणाम नहीं हैं और उदाहरण भाजपा-कांग्रेस दोनों के हैं। इसलिए शीर्षक में “8 में सिर्फ 1 सीट जीती भाजपा” का दावा नहीं रखा गया है।
