कोटा। नाबालिग बालिका से दुष्कर्म के करीब दो साल पुराने मामले में पॉक्सो क्रम संख्या-2 न्यायालय ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए नाबालिग आरोपी को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। न्यायालय ने आरोपी पर 6 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही आरोपी के मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और शैक्षणिक विकास को ध्यान में रखते हुए 21 वर्ष की उम्र तक विभिन्न सामाजिक एवं शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने के निर्देश दिए हैं।
विशिष्ट लोक अभियोजक वीरेंद्र सिंह भाणावत के अनुसार, 24 सितंबर 2024 को शहर के एक पुलिस थाने में नाबालिग बालिका के परिजनों की ओर से मामले की जानकारी सामने आई थी। आरोप के अनुसार, बालिका का नाबालिग परिचित उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया और तीन से चार दिन तक उसके साथ दुष्कर्म किया। मामले में बालिका की ओर से 25 सितंबर 2024 को मुकदमा दर्ज कराया गया था।
16 साल से अधिक उम्र होने पर वयस्क की तरह चला मुकदमा
मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी किशोर को निरुद्ध किया था और उसे किशोर सुधार गृह में रखा गया। उस समय उसकी उम्र 17 वर्ष से कम थी। किशोर न्यायालय में कार्रवाई के दौरान उसकी उम्र 16 वर्ष से अधिक पाए जाने पर मामले की फाइल वयस्क की तरह कार्रवाई के लिए पॉक्सो क्रम संख्या-2 न्यायालय भेजी गई।
इस मामले में 5 फरवरी 2025 से न्यायालय में सुनवाई चल रही थी। बुधवार को न्यायाधीश पवन अग्रवाल ने फैसला सुनाते हुए आरोपी को 20 वर्ष के कठोर कारावास और 6 हजार रुपए के जुर्माने से दंडित किया।
21 साल की उम्र तक किशोर सुधार गृह में रहेगा
विशिष्ट लोक अभियोजक ने बताया कि वर्तमान में आरोपी की उम्र 18 वर्ष और 19 दिन है। न्यायालय के आदेश के अनुसार उसे
21 वर्ष की उम्र तक किशोर सुधार गृह में रखा जाएगा। इसके बाद उसे केंद्रीय कारागार भेजा जाएगा।
रोजाना शिक्षा और कौशल विकास के लिए देना होगा समय
न्यायालय ने आरोपी के सुधार और विकास को ध्यान में रखते हुए सजा के साथ कई गतिविधियों में शामिल होने के निर्देश भी दिए हैं। उसे रोजाना दो घंटे किसी तकनीकी या अन्य शैक्षणिक संस्थान में परामर्श, शिक्षा एवं कौशल विकास से जुड़ी गतिविधियों में भाग लेना होगा।
इसके अलावा रोजाना दो घंटे पौधारोपण अथवा अन्य कार्य करने के लिए उपवन संरक्षक या इसी स्तर के कार्यालय में काम करना होगा।
वहीं, रोजाना एक घंटा सामाजिक सेवा के लिए देना होगा। इसके तहत उसे अपने घर अथवा किसी आश्रय स्थल पर सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ बुजुर्गों या मानसिक रूप से कमजोर लोगों की सेवा करनी होगी।
न्यायालय के निर्देश के अनुसार ये तीनों गतिविधियां आरोपी को 21 वर्ष की उम्र तक करनी होंगी।
