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ताश जैसी प्रवृत्तियों से बचें, आत्मचिंतन में लगाएं मन : नंदीषेण मुनि

रामपुरा जैन स्थानक में नियमित प्रवचन, दया और करुणा अपनाने का संदेश

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ताश जैसी प्रवृत्तियों से बचें, आत्मचिंतन में लगाएं मन : नंदीषेण मुनि
ताश जैसी प्रवृत्तियों से बचें, आत्मचिंतन में लगाएं मन : नंदीषेण मुनि
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कोटा। बाहरी सजावट से अधिक जरूरी अपने भीतर के गुणों को निखारना है। जिस प्रकार दर्पण चेहरे का वास्तविक स्वरूप दिखाता है, उसी तरह आत्मचिंतन से व्यक्ति अपने गुण-दोष पहचान सकता है। यह बात नंदीषेण मुनि ने श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में कही।

चातुर्मास के नियमित प्रवचनों में मुनिश्री ने कहा कि मन को सकारात्मक कार्यों में नहीं लगाने पर वह गलत दिशा में जा सकता है। गलत भाव और कर्म व्यक्ति को कर्मबंधन की ओर ले जाते हैं। इसलिए समय का उपयोग धर्म, आत्मचिंतन और सद्कार्यों में करना चाहिए। उन्होंने ताश खेलने जैसी प्रवृत्तियों से बचने की सीख देते हुए कहा कि इनमें द्रव्य और भाव, दोनों प्रकार की हिंसा की स्थिति बन सकती है। दया और सद्गुणों को अपनाकर ही आत्मिक उन्नति की दिशा में बढ़ा जा सकता है।

दया से प्रकट होता है प्रेम

योगेश मुनि ने कहा कि प्रेम की भाषा मनुष्य ही नहीं, जीव-जंतु भी समझते हैं। जहां दया होती है, वहां प्रेम स्वतः प्रकट होता है। तन से प्रेम करने वाले बहुत मिलते हैं, लेकिन आत्मा से प्रेम करने वाले कम होते हैं। व्यक्ति को व्यवहार में संवेदनशीलता और करुणा अपनानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि मनुष्य विवेक का उपयोग कर हिंसा और क्रूरता से बचे। धन जब लोभ और गलत साधनों का माध्यम बनता है तो पाप की ओर ले जा सकता है, जबकि दया जीवन में अनेक सद्गुण विकसित करती है।

संघ अध्यक्ष पंकज मेहता ने श्रद्धालुओं से प्रवचनों की सीख जीवन में उतारने का आग्रह किया। मंत्री अनिल दक ने बताया कि नंदीषेण मुनि, योगेश मुनि और जितेंद्र मुनि के सान्निध्य में नियमित प्रवचन हो रहे हैं। बाहर से आने वाले श्रद्धालु भी धर्मलाभ ले रहे हैं।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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