नागरिक अभिव्यक्ति । कोटा
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा में चल रहे नियमित प्रवचनों में श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा. ने कहा कि सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र की आराधना से ही जीव के भव में सुधार संभव है। आत्मा अनंत गुणों से परिपूर्ण है, लेकिन अज्ञान और कर्मों के बंधन के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाता। आत्मकल्याण के लिए व्यक्ति को आत्मा के गुणों को पहचानकर उन्हें विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि केवल धर्म की बातें सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें जीवन में अपनाना भी जरूरी है। मनुष्य को अपनी संगति, विचारों और व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। राग-द्वेष, अज्ञान और बुरे विचारों से दूर रहकर संयम तथा सदाचार का मार्ग अपनाने से आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
श्री जितेंद्र मुनि जी म.सा. ने कहा कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मा के स्वरूप को पहचानना, अहिंसा का पालन करना और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होना है। प्रत्येक जीव में आत्मा के अनंत गुण विद्यमान हैं। जब व्यक्ति सभी जीवों को अपनी आत्मा के समान मानता है, तो दूसरों को कष्ट पहुंचाने और उनके प्रति बुरा विचार रखने की प्रवृत्ति कम होती है। उन्होंने श्रावकों से जीवन में सद्भावना और आत्मशुद्धि को स्थान देने का आह्वान किया।
संघ अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को धर्म को प्राथमिकता देते हुए सभी जीवों के प्रति समानता का भाव रखना चाहिए। मंत्री अनिल दक ने कहा कि नियमित प्रवचन धर्म, ज्ञान और जीवन को सार्थक दिशा देने में सहायक हैं।
