ADVERTISEMENT
ब्रेकिंग न्यूज़
• हाड़ौती अंचल: कोटा में नए रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट के लिए 120 करोड़ का अतिरिक्त बजट स्वीकृत • चुनाव आयोग ने आगामी निकाय चुनाव हेतु वोटर लिस्ट अपडेशन की समय सीमा बढ़ाई • राजस्थान बोर्ड परीक्षा 2026 की समय सारिणी घोषित, शिक्षा विभाग की बड़ी तैयारी • टी20 वर्ल्ड कप: भारतीय टीम ने दूसरे मुकाबले में भी दर्ज की धमाकेदार जीत
नागरिक अभिव्यक्ति
होम / ताजा खबर / लेख विस्तार
ताजा खबर

जीवन का उद्देश्य बाहरी सौंदर्य नहीं, आत्मा की शुद्धि और संयम की साधना है : नंदीषेण

रामपुरा जैन स्थानक में नियमित प्रवचन, साधना, सेवा, संयम और आत्मकल्याण का दिया संदेश

संवाददाता
विशेष संवाददाता विशेष रिपोर्टर
अक्षर आकार:
जीवन का उद्देश्य बाहरी सौंदर्य नहीं, आत्मा की शुद्धि और संयम की साधना है : नंदीषेण
जीवन का उद्देश्य बाहरी सौंदर्य नहीं, आत्मा की शुद्धि और संयम की साधना है : नंदीषेण
ADVERTISEMENT
खबर शेयर करें:

कोटा। नागरिक अभिव्यक्ति। रामपुरा स्थित श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के जैन स्थानक में आयोजित नियमित धर्मसभा में मुनि नन्दीषेण म.सा. ने साधु जीवन की मर्यादाओं और आत्मशुद्धि के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने शास्त्रों में वर्णित तेलों के संदर्भ में साधु जीवन की मर्यादाओं को समझाते हुए कहा कि साधु के लिए बाहरी शरीर-सज्जा उसकी साधना और संयम की भावना के अनुरूप नहीं है।

मुनि नन्दीषेण ने बताया कि शास्त्रों में लक्षपाक, सहस्रपाक और शतपाक सहित तीन प्रकार के तेलों का उल्लेख मिलता है। उन्होंने कहा कि साधु जीवन का उद्देश्य बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और संयम की साधना है। यदि साधु शरीर की विभूषा में अधिक रुचि लेता है तो यह साधु जीवन की मर्यादाओं के विपरीत माना जाता है।

धर्मसभा में संतों ने श्रावकों को साधना, सेवा, संयम और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने तथा जिनवाणी के सिद्धांतों को जीवन में उतारने के लिए प्रेरित किया।

जो गुणग्राही है, वही मोक्ष राही है

श्री जितेन्द्र मुनिजी म.सा. ने साधना, सेवा और मोक्ष मार्ग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साधक को सिद्धि प्राप्त होने तक निरंतर साधना के पथ पर आगे बढ़ते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो दूसरों के अवगुणों के बजाय उनके गुणों को ग्रहण करता है, वही वास्तविक अर्थों में मोक्ष का पथिक बनता है।

उन्होंने जैन दर्शन में बताए गए मोक्ष मार्ग के चार प्रमुख उपाय—सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन, सम्यक चारित्र और सम्यक तप—का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका जीवन में समन्वय आवश्यक है। केवल ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त नहीं, बल्कि सही दृष्टिकोण, आचरण और तप के माध्यम से उसे जीवन में उतारना जरूरी है।

जितेन्द्र मुनिजी ने सेवा के विभिन्न स्वरूपों को बताते हुए कहा कि सेवा केवल शारीरिक रूप से किसी के काम आने तक सीमित नहीं है। वचन, विचार, विहार और व्यवहार के माध्यम से भी सेवा की जा सकती है। संघ और संतों की सेवा से व्यक्ति के भीतर विनय, अनुशासन, समर्पण और आत्मिक शुद्धता जैसे गुणों का विकास होता है।

उन्होंने वाणी के संयम को भी साधक के जीवन का महत्वपूर्ण गुण बताया। उन्होंने कहा कि कम बोलना, काम की बात करना और आवश्यकता पड़ने पर ही बोलना साधक के अच्छे लक्षण हैं। साधना केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में संयम, विवेक और अनुशासन अपनाना भी साधना का ही हिस्सा है।

मुनि जितेन्द्र ने जीवन की नश्वरता पर कहा कि नींद थोड़े समय की मौत है और मौत लंबे समय की नींद है। संघ अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि जीवन कब समाप्त हो जाए, यह निश्चित नहीं है, इसलिए मानव जीवन मिलने तक आत्मकल्याण और सद्कर्मों के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। मंत्री अनिल दक ने कहा कि नियमित प्रवचन जीवन को सार्थक दिशा देने में उपयोगी साबित हो रहे हैं।

ADVERTISEMENT
लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

comment पाठकों की प्रतिक्रिया (Comments)

अपनी राय दर्ज करें: