नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा
कोटा। संसार में जानकारी की कमी नहीं है, लेकिन उसका सही उपयोग करने वाली समझदारी बहुत कम है। जीवन में सफलता और मानसिक शांति के लिए केवल ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त नहीं, बल्कि सही-गलत का विवेक विकसित करना भी जरूरी है। रामपुरा स्थित जैन स्थानक में प्रवचन के दौरान श्री योगेश मुनि जी म.सा. ने यह बात कही। उन्होंने श्रावक के 21 गुणों में से 16वें गुण की व्याख्या करते हुए प्रतिकूल परिस्थितियों से सीख लेने और नकारात्मक अनुभवों को मन में संजोकर नहीं रखने की प्रेरणा दी।
योगेश मुनि जी ने गुरु महिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु के दर्शन और आशीर्वाद से मन में प्रसन्नता और सकारात्मकता का संचार होता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि रास्ते से गुजरते समय कोई व्यक्ति कचरे और गंदगी के पास से निकलता है, तो उसे उठाकर अपने घर नहीं ले जाता। इसी तरह जीवन में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों और नकारात्मक अनुभवों को भी मन में जमा नहीं करना चाहिए। उनसे सीख लेकर आगे बढ़ना ही समझदारी है।
उन्होंने कहा कि ज्ञान मनुष्य को महान बनाता है, जबकि विवेक उसे सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाता है। समझदारी व्यक्ति को मोह-माया और मानसिक उलझनों से बाहर निकलने की दिशा दिखाती है। जीवन में ऐसी समझ विकसित करनी चाहिए, जिससे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विवेक और मानसिक संतुलन बना रहे। गुरु के मार्गदर्शन, ज्ञान और सदाचार को अपनाकर ही जीवन को सही दिशा दी जा सकती है।
सम्यक आचरण से रुकते हैं कर्म, सदाचार से जीवन होता है सार्थक
श्री जितेंद्र मुनि जी म.सा. ने सम्यक आचरण दिवस पर प्रवचन देते हुए कहा कि सम्यक चरित्र वह है, जो आने वाले कर्मों को रोकने और संचित कर्मों का क्षय करने की दिशा में सहायक होता है। वास्तविक उपकारी वही है, जो जीव को भव भ्रमण से मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाए। इसके लिए व्यक्ति को अपने आचरण में सुधार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सदाचार, सज्जनता, नैतिकता और प्रामाणिकता सार्थक जीवन के आधार हैं। व्यक्ति का चरित्र ही उसकी वास्तविक पहचान होता है। उन्होंने कहा, “जो प्रभु से मांगता है, वह भिखारी है; जो प्रभु की मानता है, वह पुजारी है और जो प्रभु की मानकर सदाचार के मार्ग पर चलता है, वह सदाचारी है।”
जितेंद्र मुनि जी ने श्रावक जीवन में नैतिकता और प्रामाणिकता बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने चरित्र की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि चरित्र से गिरना जीवन की बड़ी क्षति है। पर पदार्थों में उलझकर अनावश्यक चर्चा करने से व्यक्ति अपने भाव बिगाड़ लेता है। परम लक्ष्य प्राप्त करना है तो बाहरी विषयों में उलझने के बजाय आत्मकल्याण पर ध्यान देना होगा।
प्रशंसा और निंदा में समभाव रखने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि प्रशंसा सुनने पर विचार करना चाहिए कि कहीं इससे अहंकार तो नहीं बढ़ रहा। वहीं, निंदा सुनने पर आत्मचिंतन का अवसर मानना चाहिए। इससे व्यक्ति को अपनी कमियों को पहचानने और उनमें सुधार करने की प्रेरणा मिलती है।
संघ के अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि प्रवचन के दौरान सामाजिक जीवन में दया, पाप से बचने और नैतिक मूल्यों को अपनाने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया। मंत्री अनिल दक ने कहा कि जैन स्थानक में चल रहे प्रवचन श्रावकों को सद्मार्ग की ओर अग्रसर कर रहे हैं।
