कोटा।
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा के तत्वावधान में आचार्य भगवन 1008 श्री हीराचंद जी म.सा. एवं भावी आचार्य श्री महेंद्र मुनि जी म.सा. के आज्ञानुवर्ती संत रत्न पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा., पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. एवं पूज्य श्री जितेंद्र मुनि जी म.सा. आदि ठाणा-3 के सानिध्य में चातुर्मास तप एवं त्याग के साथ निरंतर गतिमान है। पर्युषण पर्व के समापन अवसर पर मंगलवार को संवत्सरी महापर्व श्रद्धा और आत्मचिंतन के साथ मनाया गया। इस दौरान नंदीषेण मुनि जी म.सा ने धर्म के वास्तविक स्वरूप, आत्मशुद्धि, क्षमायाचना और कषायों पर विजय पाने का संदेश दिया। प्रवचनों में श्रद्धालुओं को अपनी भूल स्वीकार करने और जीवन में सुधार का संकल्प लेने की प्रेरणा दी गई। उन्होंने कहा कि क्रोध को जीतने का सबसे प्रभावी उपाय क्षमा है। क्षमा मनुष्य का निज गुण है और इसके माध्यम से आत्मा की शुद्धि होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं को आपसी मनमुटाव, वैर और कटुता को छोड़कर क्षमा एवं मैत्री की भावना अपनाने का संदेश दिया। संवत्सरी महापर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं ने आत्मचिंतन करते हुए जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमायाचना की तथा आपसी वैमनस्य समाप्त कर प्रेम, सद्भाव और संयम के साथ जीवन जीने का संकल्प लिया।
योगेश मुनि ने कहा कि जब दिल बड़ा होता है, तभी सच्ची क्षमायाचना संभव होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शरीर में गड़बड़ी होने पर डॉक्टर उपचार करता है, वहीं आत्मा में विकार आने पर धर्म और भगवान का स्मरण उसे शुद्ध करने का मार्ग दिखाता है। उन्होंने कहा कि संसार की परीक्षाएं याद करके होती हैं, जबकि संवत्सरी की परीक्षा अपनी भूलों को याद करके होती है। उन्होंने कहा कि जिन शासन व्यक्ति से नहीं, बल्कि उसके दुगुर्णों से लड़ना सिखाता है। यहां शस्त्र से नहीं, शास्त्र से संघर्ष करने की प्रेरणा दी जाती है। यह संघर्ष बाहरी लोगों से नहीं, बल्कि भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों से है। संवत्सरी का दिन आत्मा पर जमी पाप और विकारों की परतों को हटाने का अवसर है। इसके लिए दो बातें जरूरी हैं
—अपनी भूल स्वीकार करने की हिम्मत और उसमें सुधार करने की नीयत।
- धर्म का पहला पाठ अपने मन की गांठ खोलना है
श्री जितेन्द्र मुनि जी म.सा. ने कहा कि धर्म का पहला पाठ अपने मन की गांठ खोलना है। संसार में प्रवेश कैसा भी हो, लेकिन जीवन से विदाई शानदार होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन में ऐसे कर्म करने चाहिए कि अंतिम समय में भी आत्मा शांत और निर्मल रहे। म.सा. ने कहा कि पर्व तभी सार्थक होता है, जब मनुष्य का गर्व समाप्त हो जाए। संवत्सरी महापर्व आत्मा को पवित्र बनाने और भीतर की अशुद्धियों को दूर करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि दूषित मन ही व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है, इसलिए संवत्सरी का दिन मन को निर्मल करने का दिन है। उन्होंने कहा कि दो चीजें देखने पर ही दिखाई देती हैं—अपनी भूल और भगवान। सामान्य जीवन में व्यक्ति दूसरों की गलतियां देखता है, लेकिन संवत्सरी हमें अपनी भूलों को देखने और उन्हें स्वीकार करने की प्रेरणा देती है। आज के दिन मुख्य और गौण के अंतर को समझना आवश्यक है। मन में कषाय की वृत्ति नहीं आना ही वास्तविक साधना है।
धर्मसभा में संघ के अध्यक्ष पंकज मेहता, अशोक जैन नगर निगम, बुद्धि प्रकाश ने अपने विचार व्यक्त किए तथा तपस्वियों सोनू जैन तथा पंकज अलीगढ़ व अन्य तपस्वियों का सम्मान किया गया। मंत्री अनिल दक ने बताया कि महिला मंडल ने तपस्वियों की अनुमोदनार्थ गीत प्रस्तुत किया। अभिषेक जैन ने भजन की प्रस्तुति दी। धर्म सभा में एसपी पवन जैन, ओसवाल समाज के अध्यक्ष नरेंद्र लोढा उपस्थित हुए।
