नागरिक अभिव्यक्ति @ कोटा
बाजार में तेल खरीदते समय ग्राहक बोतल पर लिखे ‘वुड प्रेस्ड’, ‘कोल्ड प्रेस्ड’ या ‘कच्ची घाणी’ जैसे शब्दों को शुद्धता और प्राकृतिक तरीके से जोड़कर देखता है। इन्हीं दावों के आधार पर सामान्य रिफाइंड तेल से ज्यादा कीमत भी चुकाता है। कोटा में खाद्य तेल के कारोबार की जांच में ऐसा मामला सामने आया है, जिसने इसी भरोसे पर सवाल खड़े किए हैं।
विभागीय कार्रवाई में करीब 170 किलो कीमत वाला रिफाइंड राइस ब्रान ऑयल मिला, जिसे ‘श्री अनन्तम’ के नाम से 350 प्रति लीटर में पैक कर ऑनलाइन बेचने की बात सामने आई। मौके पर 600 किलो रिफाइंड तेल और 240 पैक्ड बोतलें मिलीं, लेकिन वुड प्रेस्ड ऑयल तैयार करने के लिए घाणी या कोल्हू संचालित नहीं मिला। यह अकेला मामला नहीं है। पिछले करीब दो साल में कोटा-संभाग में तेल, घी और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर हुई कार्रवाइयों को साथ रखकर देखें तो उत्पाद की पहचान, पैकेजिंग, निर्माण प्रक्रिया और गुणवत्ता पर बार-बार सवाल उठे हैं।
दरअसल, 3 सितंबर को कृष्णा नगर, रंगबाड़ी स्थित केशव एग्रो इंडस्ट्रीज में खाद्य सुरक्षा दल ने औचक निरीक्षण किया। मौके पर रिफाइंड राइस ब्रान ऑयल के 40 टिन मिले। प्रत्येक टिन 15 किलो का था यानी कुल 600 किलो। इनकी कीमत करीब 170 प्रति किलो थी। इसी तेल को ‘श्री अनन्तम’ के नाम से एक-एक लीटर की बोतलों में पैक किया जा रहा था और 350 प्रति लीटर में ऑनलाइन अमेजन पर बेचा जा रहा था। मौके पर 240 बोतलें पैक मिलीं। टीम ने टिन और बोतलों से नमूने लिए और 40 टिन व 236 बोतलें सीज कर दीं। सबसे अहम तथ्य यह रहा कि मौके पर वुड प्रेस्ड ऑयल बनाने वाली घाणी या कोल्हू का संचालन नहीं मिला। अगर उत्पाद वुड प्रेस्ड था तो उसकी निर्माण प्रक्रिया कहां हुई? और अगर तेल बाहर से तैयार होकर आया था तो उसके स्रोत और वुड प्रेस्ड होने के दस्तावेज कहां हैं? अभी लैब रिपोर्ट आना बाकी है। जांच यह स्पष्ट करेगी कि पैकिंग पर किया गया दावा उत्पाद की वास्तविक प्रकृति और निर्माण प्रक्रिया से मेल खाता है या नहीं। मौके पर वुड प्रेस्ड सरसों, अलसी और तिल्ली के तेल की पैकिंग भी मिली।
फर्म संचालक ने इन्हें बूंदी स्थित श्रीराम ऑयल मिल्स से खरीदना बताया। विभाग के अनुसार इन तेलों को 180-200 प्रति किलो में खरीदकर 350-500 प्रति किलो तक बेचने की बात स्वीकार की गई। लेकिन, इनके संबंध में वैध बिल या ऐसे दस्तावेज मौके पर पेश नहीं किए जा सके, जिनसे इनके वुड प्रेस्ड होने की पुष्टि हो।
कमाई करने को किया जा रहा हर तरह का छल
फरवरी 2025 : ‘स्वारथिक’ नाम से 1,860 किलो तेल
कोटा में ‘निवाई स्वारथिक’ नाम से बिक रहे मूंगफली तेल पर कार्रवाई हुई। 1,860 किलो तेल सीज किया गया। नाम और पैकेजिंग ‘निवाई स्वास्तिक’ से मिलती-जुलती होने की बात सामने आई। नमूने जांच के लिए भेजे गए।
अप्रैल 2025 : 3,900 लीटर मूंगफली तेल सीज
रामपुरा की बाबा ट्रांसपोर्ट कंपनी में ‘स्वार्तिक’ ब्रांड का 3,900 लीटर मूंगफली तेल मिला। विभाग को मूंगफली तेल के नाम पर दूसरे तेल की मिलावट का शक था। तीन नमूने लिए गए और पूरा स्टॉक सीज किया गया।
जनवरी 2026 : घी के नाम पर वनस्पति की पैकिंग
रीको इंडस्ट्रियल एरिया की फैक्ट्री में घी के नाम पर कुकिंग मीडियम/वनस्पति पैक किए जाने की कार्रवाई हुई। अलग-अलग जगहों से घी-तेल जब्त हुए। एक पुराने अनसेफ घी की सप्लाई चेन की जांच में रंगबाड़ी की फर्म से 1,890 किलो घी भी जब्त किया गया।
सितंबर 2026 : रिफाइंड तेल बना ‘वुड प्रेस्ड’
केशव एग्रो इंडस्ट्रीज में 600 किलो रिफाइंड राइस ब्रान ऑयल मिला। इसे ‘श्री अनन्तम वुड प्रेस्ड’ नाम से 350 प्रति लीटर में पैक कर बेचा गया। मौके पर घाणी-कोल्हू नहीं मिला।
जनता के साथ ठगी कर रहे जालसाज
यह सीधे-सीधे आम जनता के साथ ठगी है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से जनता रिफाइंड तेल का उपयोग नहीं करना चाहती और इस (कच्ची घाणी) तेल का प्रयोग करती है, लेकिन यह ‘कच्ची घाणी’ नाम का इस्तेमाल कर उनके साथ धोखा कर रहे हैं। हम इस पर सख्त नजर बनाए हुए हैं और लगातार कार्रवाई की जा रही है। - संदीप अग्रवाल, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, कोटा
कोटा में 31.57% सैंपल मानकों पर खरे नहीं
कोटा-हाड़ौती में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर फूड सेफ्टी विभाग के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 के बीच राजस्थान के 41 जिलों में 31,347 खाद्य सैंपल लिए गए। इनमें 7,653 यानी 24% से ज्यादा नमूने अमानक, मिसब्रांडेड या फेल श्रेणी में पाए गए। इनमें 273 मिसब्रांडेड, 6,625 सब-स्टैंडर्ड और 755 फेल थे। कोटा में यह आंकड़ा 31.57% रहा। यानी जांचे गए हर 100 नमूनों में करीब 32 में मानकों से जुड़ी समस्या मिली। हाड़ौती में बारां का आंकड़ा 32.01%, बूंदी का 22.04% और झालावाड़ का 20.78% रहा। यह आंकड़े यह नहीं कहते कि 24% खाद्य पदार्थ जहरीले हैं। अमानक, मिसब्रांडेड और फेल अलग-अलग श्रेणियां हैं। लेकिन यह जरूर बताते हैं कि जांच के दायरे में आए खाद्य उत्पादों में बड़ी संख्या गुणवत्ता या लेबलिंग संबंधी मानकों पर खरी नहीं उतरी।
