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लाज़रस सिंड्रोम: मौत को मात देती इंसानी जिजीविषा

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लाज़रस सिंड्रोम: मौत को मात देती इंसानी जिजीविषा
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डॉ. सुरेश पाण्डेय

नेत्र चिकित्सक, लेखक, प्रेरक वक्ता

भरतीय जनमानस में मृत्यु पर विजय पाने या मौत के मुंह से वापस लौटने की जब भी बात आती है, तो अनायास ही सती सावित्री और सत्यवान की कालजयी पौराणिक कथा जेहन में उभर आती है। हम सदियों से यह कथा सुनते आए हैं कि कैसे सावित्री ने अपने अगाध प्रेम, तपोबल और अटूट संकल्प से साक्षात यमराज का मार्ग रोक लिया था और अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस छीन लाई थी। यह महज़ एक कथा नहीं है, बल्कि इंसानी जिजीविषा और मृत्यु के अंतिम सत्य को चुनौती देने की हमारी उस आदिम आकांक्षा का प्रतीक है, जो जीवन के प्रति हमारी अनंत चाहत को दर्शाती है। सदियों पुरानी यह कथा हमें यह विश्वास दिलाती है कि जीवन और मृत्यु के बीच की लकीर कभी-कभी उतनी अटल नहीं होती, जितना हम मान लेते हैं।

इसी पौराणिक स्मृति को दिनांक 21 नवंबर 2024 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के एक श्मशान घाट ने क्षण भर के लिए तब जीवंत कर दिया, जब चिता पर लेटे एक 'मृत' शरीर ने यमराज के द्वार से जैसे अपने कदम वापस खींच लिए। यह झकझोर देने वाली कहानी 25 वर्षीय मूक-बधिर युवक रोहिताश कुमार की थी, जो दुनिया में बिल्कुल अकेला था और एक शेल्टर होम में अपना जीवन काट रहा था। 21 नवंबर को अचानक तबीयत बिगड़ने पर उसे झुंझुनू के बीडीके (भगवान दास खेतान) सरकारी अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में लाया गया। डॉक्टरों ने जांच के बाद दोपहर करीब दो बजे उसे आधिकारिक तौर पर मृत घोषित कर दिया। दुनिया में उसका अपना कोई नहीं था, इसलिए पुलिस और प्रशासन ने ही उसके अंतिम संस्कार का जिम्मा उठाया। उसे सफेद कफन में लपेटकर श्मशान घाट ले जाया गया। लकड़ियों की चिता सज चुकी थी, बस मुखाग्नि देना ही बाकी था कि तभी वहां मौजूद लोगों की सांसें अटक गईं। उस निर्जीव शरीर के सीने में अचानक कंपन हुआ और उसकी सांसें चलने लगीं। मौत की नींद सो चुके उस युवक को आनन-फानन में चिता से उठाकर तुरंत वापस आईसीयू में भर्ती कराया गया।

नियति की क्रूर विडंबना यह रही कि सत्यवान के उलट, रोहिताश के लिए यमराज से लड़ने वाली कोई सावित्री वहां मौजूद नहीं थी। एक दिन बाद बेहतर इलाज के लिए जयपुर ले जाते समय रास्ते में उसने सचमुच दम तोड़ दिया। लेकिन, चिता पर उसके दोबारा जीवित होने की उस घटना ने तंत्र, समाज और चिकित्सा विज्ञान के सामने अनगिनत गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

झुंझुनू की यह घटना कोई इकलौता मामला नहीं है। मौत को मात देकर लौटने के ऐसे विस्मयकारी मामले हाल ही के वर्षों में कई बार सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जून 2023 में इक्वाडोर की 76 वर्षीय महिला बेला मोंटोया अपनी मौत की घोषणा के कई घंटों बाद, अपनी ही शोक सभा के दौरान ताबूत को भीतर से खटखटाकर उठ बैठी थीं। आधुनिक विज्ञान की भाषा में इसे 'लाज़रस फिनॉमेनन' या 'लाज़रस सिंड्रोम' कहा जाता है। इसका नामकरण बाइबिल की उस कथा पर है, जिसमें ईसा मसीह ने लाज़रस को मृत्यु के चार दिन बाद जीवित कर दिया था। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, यह वह अत्यंत दुर्लभ स्थिति है जब किसी मरीज का दिल धड़कना बंद कर देता है, डॉक्टर उसे बचाने के लिए सीपीआर सहित अथक प्रयास करते हैं, लेकिन जब कोई संकेत नहीं मिलता और प्रयास बंद कर दिए जाते हैं, तो कुछ मिनटों या घंटों बाद मरीज का रक्त-संचार स्वतः लौट आता है।

यह किसी विज्ञान-कथा जैसा लगता है, लेकिन शरीर की जटिल रचना इसका रहस्य खोलती है। दरअसल, सीपीआर के दौरान डॉक्टर छाती को जोर-जोर से दबाते हैं और फेफड़ों में हवा पंप करते हैं। इससे कई बार छाती के अंदर का दबाव इतना बढ़ जाता है कि वह रक्त को वापस हृदय तक पहुंचने से रोक देता है। जब डॉक्टर थक-हारकर अपनी कोशिशें रोक देते हैं और वेंटिलेटर हटा लेते हैं, तो छाती के अंदर फंसी हवा बाहर निकल जाती है। दबाव कम होते ही रुका हुआ खून तेजी से वापस दिल की ओर दौड़ पड़ता है। साथ ही, सीपीआर के दौरान दी गई जीवन-रक्षक दवाएं भी अचानक हृदय तक पहुंच जाती हैं। इस बदलाव से दिल का इलेक्ट्रिकल सिस्टम फिर से सक्रिय हो जाता है और वह धड़कने लगता है।

यह घटना कितनी विरल है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1982 से लेकर 2025 के अंत तक के वैश्विक अध्ययनों के अनुसार, विश्व के संपूर्ण प्रामाणिक चिकित्सा साहित्य में इसके कुल मिलाकर केवल 82 मामले ही दर्ज किए गए हैं। इनमें से कुछ मरीजों ने रोहिताश की तरह जल्द दम तोड़ दिया, लेकिन सुखद आश्चर्य यह है कि इन 82 में से कई मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने घर गए और एक सामान्य जीवन जिया। झुंझुनू की यह दहला देने वाली घटना और लाज़रस फिनॉमेनन हमें एक बहुत ही गहरा दार्शनिक और चिकित्सकीय सबक देता है। यह प्रमाणित करता है कि मृत्यु हमेशा कोई एक पल की घटना नहीं, बल्कि एक जटिल प्रक्रिया है। आज के आधुनिक चिकित्सा दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से कहते हैं कि सीपीआर बंद करने के बाद भी मरीज को तुरंत मृत घोषित नहीं करना चाहिए, बल्कि कम से कम दस से पंद्रह मिनट तक ईसीजी मशीन पर उसकी निगरानी करनी चाहिए। जल्दबाजी में एक शरीर को मृत मानकर सफेद चादर से ढक देना किसी भी परिवार और चिकित्सा पेशे के लिए त्रासदी ला सकता है। सती सावित्री का संकल्प हो या झुंझुनू के श्मशान की वह चिता, ये हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि इंसानी शरीर की वापसी की क्षमता अत्यंत रहस्यमयी है। जीवन की आखिरी सांस और मृत्यु की शांति के बीच की वह लकीर कभी-कभी बहुत धुंधली होती है, और चिकित्सा विज्ञान को उस पवित्र लकीर का सम्मान अत्यंत धैर्य और वैज्ञानिक सजगता के साथ करना चाहिए।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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