मर्गदर्शन ऐसा रास्ता है जिससे न मार्ग मिलता है न दर्शन की प्राप्ति होती है। फिर भी लोग मार्गदर्शन के लिए लालायित और उत्सुक रहते हैं। हमारे देश में बुजुर्गों , अनुभवियों और भुक्तभोगियों से मार्गदर्शन प्राप्त करने की पुष्ट और प्राचीन परंपरा रही है। यह परंपरा इतनी विश्वसनीय और प्रचलित है कि कई बार मार्गाकांक्षी यह भूल ही जाता है कि मैं जिससे ज्ञान प्राप्त करने जा रहा हूँ वे स्वयं ही भटका हुआ मेघ हैं। यदि यह इतने ही पहुँचे हुए सिद्धात्मा होते तो इन्हें ही गंतव्य न मिल जाता। ये अभी तक दिशा सूचक से राह में क्यों लटके हुए होते? ठाम पर बैठकर धूप , दीप , नैवैद्य से पुज न रहे होते भला? मार्ग पर तरह- तरह के लुच्चे -लफ़ंगे , बटमार दुकानें सजाए बैठे हैं। सब का दावा है कि उन पर है शर्तिया इलाज। कोई लाल किताब खोले बैठा है तो कोई कुंडली जागरण की विद्या बताता है।
शुरू से हमारा देश मार्गदर्शकों का देश रहा है। आर्त्तजन की पुकार सुन करुणानिधान चलते रहे हैं। कई बार चेला ही पैर पकड़ कर लटक जाता था अब लौ नसानी अब नसेहूँ। सीढ़ियों पर लेट जाता है दिखानी पड़ती है टार्च की रोशनी गुरु को। लेकिन उस युग में बेईमानी न थी, कड़ी परीक्षाओं के बाद भी ज्ञान मिलता था, गारंटी थी उद्धार की। लो इन्वेस्टमेंट और हाई गेन। आजकल बंदा सब कुछ दांव पर लगा दे तब भी मार्ग पर कार्य प्रगति पर है डाइवर्जन का प्रयोग करें का बोर्ड लगा मिलता है।
राजनीति के जंगल में शेरों , सियारों और लकड़बग्घों का जमघट और दरकार है वहाँ इन खगों की भाषा कौन सुनने वाला है। इनके नख , दंत झर चुके हैं। वत्स ! जाओ इनको निकायों, आयोगों और राजभवनों में जाकर सजा दो। इनकी सेवाओं से कृत कृत्य होकर हाईकमान इनको नवाज़ता है। कुछ को तो न माया मिलती है न राम। वे ऐसे फ़ानूस हैं जो उपेक्षा का गर्द ओढ़े हुए आजीवन सभागारों में लटके रहेंगे।
सरकारी कार्यालयों में मार्गदर्शन माँगना एक औपचारिक कार्यक्रम है। प्रायः अधिकारी अपनी बला टालने या स्वयं की जान बचाने की गरज से उच्च कार्यालय के सम्मुख मार्गदर्शन का कटोरा फैला देते हैं। उच्च अधिकारी कौन से कम घाघ हैं वे ठहरे अनुभवी आत्मा, उन्होंने घाट घाट का पानी पिया है तभी तो वो उच्चासीन हैं। एक दो रिमाइंडर तक तो उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। क्योंकि ऐसा करना उनकी पूर्व स्थापित परंपराओं का भंजन होगा। जो सरासर अनुशानहीनता की श्रेणी में आता है। कई अनुस्मारकों के बाद उनकी नींद टूटती है और फिर भी उलटबाँसी शैली में मार्गदर्शन मिलता है। जिसका भावार्थ समझना सूर के दृष्टकूट पदों के भावार्थ समझने से कम नहीं। कई विभाग या अधिकारी ऐसी साधनामूलक रहस्यवादी शैली में निर्देश भेजते हैं कि- इस संदर्भ में आपको अमुक दिनांक को अमुक पत्र, फ़मुक क्रमांक से ढमुक पत्र भेजा गया था।
कृपया उसकी क्रम संख्या दो और तीन का अवलोकन करें। अरे भाई अवलोकन से हमें समझ आ जाता तो आपको क्यों भेजते ? लेकिन यही है मार्गदर्शन की गूढ़ कला। यह कला है या विज्ञान यह शोध का विषय अवश्य है। कुछ लोग इसे टालू कला और कुछ ड्रिब्लिंग का विज्ञान समझते हैं आख़िर कैसे टोपी दूसरे पर खिसकायी जाए। अब मार्ग पर चलना तो नियति है। लेकिन फिसलना , दौड़ना , रपटना या ठहरना आपका स्वभाव या गति। मेगा मिड वे से लेकर ढाबे तक खुले हुए हैं। पैसा बहाने के तमाम उपक्रम आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं , मदिरालय बाट जोह रहे हैं। लीजिए मार्गदर्शन। भले ही आदमी घर से बांध कर नींबू का अचार और पराठे लाये लेकिन मलाई कोफ़्ता देखकर मन भटक ही जाता है। यायावर को क्या चाहिए मार्गदर्शन? ऐसे दर्शनाभिलाषियों की कामनाएँ अनंत हैं, अपार हैं। स्पा सेंटर और ब्यूटी पार्लर खुले हुए हैं आप भी ट्राई कर लीजिए, क्या पता आपकी भटकन को कहीं कोई अटकन मिल जाए मार्गदर्शन की।
