कल्पना कीजिए एक ऐसे घर की, जहां किसी छात्र या छात्रा ने दो तीन वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद नीट परीक्षा में सफलता पाकर पहली बार मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेकर अपना सूटकेस तैयार किया है। उस समय माता-पिता की आंखों में एक विशेष चमक होती है, उनका बच्चा अब सफेद कोट पहनेगा, गले में स्टेथोस्कोप डालेगा, गंभीर रोगियों के प्राण बचाने वाले सम्मान जनक चिकित्सा पेशे का आधार स्तम्भ बनेगा। लेकिन, क्या होता है जब वही मेडिकल रेजिडेंट चिकित्सक, जो दूसरों को जीवनदान देने गया था, किसी दिन मानसिक रूप से पूरी तरह टूटकर, किसी सफेद कफन में लिपटकर घर लौटता है? तब केवल एक परिवार नहीं उजड़ता, बल्कि हमारी पूरी चिकित्सा व्यवस्था, हमारी सामाजिक संवेदना और हमारी इंसानियत हार जाती है।
जिस चिकित्सा व्यवस्था में वह सीखने, सेवा करने और एक कुशल डॉक्टर बनने आया था, यदि वही व्यवस्था उसे भय, अपमान और गहरे अवसाद के गर्त में धकेलने लगे, तो हमें रुककर खुद से पूछना ही होगा, क्या यह प्रशिक्षण है या कोई संस्थागत आघात? हाल ही में इंदौर के प्रसिद्ध एमजीएम मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पताल में प्रथम वर्ष की पीजी रेजिडेंट डॉ. सिम्मी यादव द्वारा कथित रूप से आत्महत्या के प्रयास की हृदयविदारक घटना ने इस सुलगते हुए सवाल को फिर से सतह पर ला दिया है। लंबे ड्यूटी घंटों, मानसिक उत्पीड़न और विभाग में अलग-थलग कर दिए जाने के आरोप एक गहरी और जानलेवा बीमारी के लक्षण हैं।
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) के डराने वाले आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में 120 से अधिक मेडिकल विधार्थियों और पीजी रेजिडेंट्स ने मौत को गले लगा लिया, जबकि 1200 से अधिक मेडिकल स्टूडेंट्स ने भारी तनाव के कारण अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। हाल ही में, जून 2026 में 28 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हुए फैमा सर्वे ने इस पीड़ा को प्रतिशत में मापा, 87.5% युवा डॉक्टरों ने भयानक बर्नआउट, 87.8% ने नींद की गंभीर कमी और लगभग 17% ने कार्यस्थल के तनाव के कारण आत्महत्या के विचार आने की बात स्वीकार की। इस त्रासदी की सबसे बड़ी जड़ वह सड़ी-गली और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही मानसिकता है जो कहती है, "हमने अपने समय में गालियां खाईं, 48 घंटे बिना सोए काम किया, अपमान सहा, तो आज के जूनियर्स को भी यह सब सहना ही पड़ेगा। हमें यह समझना होगा कि यदि हमने अपने प्रशिक्षण के दौरान कोई अनुचित कष्ट सहा था, तो हमारी जिम्मेदारी उस पीड़ा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना नहीं, बल्कि उसे अपनी ही पीढ़ी पर समाप्त कर देना है।
मेडिकल रेजिडेंसी का प्रशिक्षण कठिन होना ही चाहिए, क्योंकि मानव जीवन की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। लेकिन 'कठोर' प्रशिक्षण और 'क्रूर' प्रशिक्षण के बीच एक बहुत बारीक, मगर स्पष्ट रेखा होती है। किसी की गलती सुधारना शिक्षा है, लेकिन वार्ड में सबके सामने उसकी गरिमा को रौंदना शिक्षा नहीं, मानसिक हिंसा है।
अब केवल शोक जताने, खोखले परिपत्र जारी करने और बंद कमरों की बैठकों से आगे बढ़ने का वक्त आ गया है। ड्यूटी रोस्टर पारदर्शी हों, काम के घंटों की अधिकतम सीमा तय हो, अनिवार्य विश्राम मिले और हर मेडिकल कॉलेज में एक स्वतंत्र, गोपनीय व विश्वसनीय शिकायत निवारण तंत्र हो, जहां शिकायतकर्ता पर प्रतिशोध की गुंजाइश शून्य हो। आज समय आ गया है कि अस्पताल उन डॉक्टरों के लिए भी सुरक्षित बनें, जो अपनी नींद, अपनी जवानी और अपना सुकून दांव पर लगाकर दूसरों की सांसें बचा रहे हैं। क्योंकि मेडिकल रेजिडेंसी का अंतिम उद्देश्य समाज को एक उत्कृष्ट, संवेदनशील और बेहतर डॉक्टर देना है, एक टूटा हुआ, डरा हुआ और अवसादग्रस्त इंसान नहीं।
