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अल्पवयस्क की सम्पत्ति खरीदने से पहले सावधानी?

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अल्पवयस्क की सम्पत्ति खरीदने से पहले सावधानी?
अल्पवयस्क की सम्पत्ति खरीदने से पहले सावधानी?
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अल्पवयस्क के स्वामित्व की सम्पत्ति खरीदना सामान्य सम्पत्ति-क्रय जैसा नहीं है। अभिलेखों में माता-पिता या संरक्षक का नाम दर्ज होने मात्र से वे सम्पत्ति के मालिक नहीं हो जाते। वास्तविक स्वामी अल्पवयस्क होता है और संरक्षक केवल उसकी ओर से सम्पत्ति का प्रबन्ध करता है। इसलिए ऐसी सम्पत्ति खरीदने से पहले कानूनी स्थिति की पूरी जांच जरूरी है।

ये पांच बातें जरूर जानें

1) संरक्षक सम्पत्ति का मालिक नहीं

माता-पिता या संरक्षक का नाम अभिलेखों में होने मात्र से वे अल्पवयस्क की सम्पत्ति के मालिक नहीं बन जाते। संरक्षक केवल अल्पवयस्क के हित में सम्पत्ति का प्रबन्ध करता है। वह अपनी इच्छा, पारिवारिक सहमति या निजी आर्थिक जरूरत के आधार पर सम्पत्ति नहीं बेच सकता।

2) न्यायालय की पूर्व अनुमति जरूरी

हिन्दू अल्पवयस्क की पृथक अचल सम्पत्ति बेचने के लिए हिन्दू अल्पवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत सक्षम न्यायालय की पूर्व अनुमति आवश्यक है। न्यायालय अनुमति तभी देता है, जब विक्रय अल्पवयस्क की वास्तविक आवश्यकता या उसके प्रत्यक्ष और सुनिश्चित लाभ के लिए हो।

3) अनुमति की शर्तों की जांच करें

न्यायालय विक्रय की समय-सीमा, न्यूनतम मूल्य, विक्रय की पद्धति तथा बिक्री की रकम जमा या निवेश करने जैसी शर्तें लगा सकता है। इसलिए खरीदार को केवल अनुमति-आदेश देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी प्रत्येक शर्त का पालन हुआ है या नहीं, यह भी जांचना चाहिए।

4) बिना अनुमति की बिक्री चुनौती योग्य

प्राकृतिक संरक्षक द्वारा न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना अल्पवयस्क की पृथक सम्पत्ति बेचने पर ऐसा विक्रय सामान्यतः स्वतः शून्य नहीं होता, बल्कि अल्पवयस्क के विकल्प पर निरस्त किया जा सकता है। सामान्यतः अल्पवयस्क वयस्क होने की तारीख से तीन वर्ष के भीतर ऐसे विक्रय को चुनौती दे सकता है।

5) संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में अलग नियम

यदि अल्पवयस्क का हित संयुक्त हिन्दू परिवार की अविभाजित सम्पत्ति में है और उसका प्रबन्ध वयस्क कर्ता कर रहा है, तो धारा 8 की पूर्व अनुमति वाली व्यवस्था उसी तरह लागू नहीं होती, जैसी अल्पवयस्क की पृथक सम्पत्ति पर होती है। फिर भी कर्ता को विक्रय के लिए विधिक आवश्यकता या सम्पदा के वास्तविक लाभ को साबित करना पड़ सकता है।

खास टिप

अल्पवयस्क की सम्पत्ति खरीदने में सबसे बड़ा भ्रम यह है कि माता-पिता होने के कारण उन्हें सम्पत्ति बेचने का पूरा अधिकार है। कानून की नजर में माता-पिता मालिक नहीं, बल्कि अल्पवयस्क के हितों के संरक्षक हैं। इसलिए खरीद से पहले संरक्षक का विधिक अधिकार, न्यायालय की पूर्व अनुमति और अनुमति-आदेश की प्रत्येक शर्त की जांच जरूर करें। विक्रयपत्र में संरक्षक से उसकी व्यक्तिगत हैसियत में क्षतिपूर्ति की शर्त लेना उपयोगी है, लेकिन यह न्यायालय की आवश्यक अनुमति का विकल्प नहीं है।

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लेखक

विशेष संवाददाता

नागरिक अभिव्यक्ति विशेष डिजिटल रिपोर्टर एवं विश्लेषक।

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