1986 में महिला शिक्षा से शुरू हुआ समाज को लौटाने का सफर 3600 विद्यार्थियों तक पहुंचा
कोटा का मोदी परिवार और मोदी ग्रुप आज किसी पहचान का मोहताज नहीं है। लेकिन इस पहचान के पीछे संघर्ष, जिद और जुनून के साथ समाज को वापस लौटाने की एक लंबी कहानी है। झुंझुनू के शेखावाटी क्षेत्र से काम की तलाश में 1978 में कोटा आए परिवार ने लाल-नीलेपत्थरों की ट्रेडिंग से शुरुआत की। कोटा स्टोन की खान के बाद वेल्डिंग रॉड उद्योग में कदम रखा और भारतीय रेलवे सहित देशभर में पहचान बनाई।
कारोबार ने आर्थिक आधार मजबूत किया तो 1986 में महिला शिक्षा के जरिए समाज को कुछ लौटाने का फैसला लिया। यह राह आसान नहीं थी। उस दौर में हाड़ौती में महिला उच्च शिक्षा के अवसर बेहद सीमित थे और इसी सोच के साथ क्षेत्र का पहला महिला कॉलेज स्थापित किया गया। महिला कॉलेज से शुरू हुआ सफर आज स्कूल, तकनीकी, प्रबंधन और विधि शिक्षा तक पहुंच चुका है, जहांकरीब 3600 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। मोदी ग्रुप के चेयरमेन सुशील मोदी का मानना हैं, “कारोबार और कमाई जीवन के संचालन के लिए जरूरी हैं, लेकिन असली जिम्मेदारी उससे बनी अपनी क्षमता को समाज के काम में लगाना है।” नागरिक अभिव्यक्ति से विशेष बातचीत में उन्होंने संघर्ष, कारोबार, शिक्षा और भविष्य के विजन पर बेबाकी से अपनी बात रखी।
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मोदीग्रुप शिक्षा जगत में बड़ा नाम है, लेकिन परिवार की इस यात्रा की शुरुआत आखिर कहां से हुई?
जवाब: हमारा मूल निवास झुंझुनू के शेखावाटी क्षेत्र में है। वर्ष 1978 में पिताजी अपने भाइयों और दादाजी के साथ काम की तलाश में कोटा आए थे। शुरुआत में परिवार ने लाल और नीले पत्थरों की ट्रेडिंग का काम किया। बाद में मोड़क क्षेत्र के पीपाखेड़ी में कोटा स्टोन की खान खरीदकर खनन शुरू किया गया। उस समय बच्चों की बेहतर शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। इसलिए तय हुआ कि पिताजी कोटा में रहेंगे, ताकि परिवार के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके। इसी के साथ 1981 में परिवार का कोटा से स्थायी जुड़ाव मजबूत हुआ।
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यानी शुरुआत शिक्षा से नहीं, कारोबार से हुई। बिजनेस कैसे खड़ा किया?
जवाब : वह बेहद संघर्ष का दौर था। पिताजी ने लंबे समय तक काम की तलाश की और फिर वेल्डिंगरॉड का प्लांट स्थापितकिया। उस समय यह देश का चौथा वेल्डिंगरॉड प्लांटथा। मेहनतके दम पर कारोबारआगे बढ़ा और भारतीयरेलवे, विभिन्नराज्यों की रोडवेज वर्कशॉपसहित दमन-दीव, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप तक हमारा माल पहुंचता था। पिताजी शुरू से समाज को बहुत महत्व देते थे। इसलिएजब कारोबारचल निकलातो उन्होंनेसमाज को कुछ लौटानेकी ठानी।वर्ष 1986 में कोटा में बेिटयों के लिए निजी क्षेत्र में उच्च शिक्षाकी पर्याप्तव्यवस्था नहीं थी इसलिएउनकी शिक्षाऔर उत्थानके लिए हाड़ौती के पहले गर्ल्सकॉलेज की स्थापना की। पिताजी कई सामाजिक संस्थाओंसे जुड़ेरहे और उन्होंने तन-मन-धन से समाज सेवा की। भारत विकासपरिषद सहित कई सामाजिकऔर धार्मिकगतिविधियों में उनका योगदानरहा। उनकी सोच बहुत साफ थी- समाज के लिए काम करना है, राजनीतिक लाभ के लिए नहीं।
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आपनेविरासत कैसे संभाली? क्या बदलाव किए और इसे कहां तक आगे ले जा पाए?
जवाब : मैं 18 साल की उम्र से पहले ही कारोबार से जुड़ गया और पढ़ाई के साथ-साथ काम को भी समझा। शुरुआती पढ़ाई पिलानी में हुई और बाद में मैंने अमेरिका से एमबीए की डिग्री की। मैं लौटा तो पिताजी धीरे-धीरे समाज सेवा में अधिक समय देने लगे। करीब 14 साल पहले उनका निधन हुआ। उन्होंने एमआईटी-मोदी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजीकी स्थापना की थी। इसके बाद हमने अन्य शैक्षणिक गतिविधियोंका विस्तार किया। पुराने कॉलेज में नए एमएससी कोर्स शुरू किए गए और मोदी लॉ कॉलेज की स्थापना की गई। आज मोदी महिला महाविद्यालय, मोदी पब्लिक स्कूल, मोदी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मोदी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी और मोदी लॉ कॉलेज हमारे प्रमुख संस्थान हैं। इनमें करीब 3600 विद्यार्थीअध्ययनरत हैं और शिक्षकों व अन्य कर्मचारियों सहित लगभग 750 से 1000 लोगों का स्टाफ जुड़ा हुआ है। मन में सुकून है कि शिक्षा के माध्यम से समाज को कुछ लौटा पा रहे हैं।
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लेकिन, शिक्षा का व्यवसायीकरण तो दिखता हैं..? जबकी कई संस्थान मापदंड तक पूरे नहीं करते.?
जवाब: मैं हमेशा कहता हूं कि जिस कारोबार से लोगों का नुकसान हो, उसकीतुलना शिक्षा से नहीं की जा सकती। शिक्षा के माध्यम से हम बच्चों का भविष्य बनाने का काम कर रहे हैं, इसलिए इसे सिर्फ व्यापार कहना उचित नहीं है। हां, जो स्कूल या कॉलेज तय मापदंड पूरे नहीं करते, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। किसी भी प्रभाव के आधार पर शिक्षा संस्थान चलाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। इससे ईमानदारी से नियम पूरे करने वाले संस्थानों का नुकसान होता है। ऑनलाइन सिस्टम, डिजिटल रिकॉर्ड और प्रभावी ट्रैकिंग व्यवस्था जरूरी है, ताकिशिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता बनी रहे।
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सरकार की नीतियों और नियमों से किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
जवाब : पिछले कुछ वर्षों में एफिलिएशन और इंस्पेक्शन फीस में काफी वृद्धि हुई है। फायर एनओसी और दूसरे अनुपालनोंके नाम पर भी संस्थानों पर लगातार आर्थिक बोझ बढ़ा है। कई छोटे संस्थानोंके लिए यह बड़ी चुनौती बन जाती है। विद्यार्थियों की संख्या कम होने के बावजूद उन्हें तय शुल्क और अनुपालन से जुड़े खर्च पूरे करने पड़ते हैं। नियम जरूरी हैं, लेकिन वे व्यावहारिक भी होने चाहिए।
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परिवार के बारे में बताइए। अगली पीढ़ी कब इस विरासत की जिम्मेदारी संभालेगी?
जवाब : मेरे पिताजी स्वर्गीय रामनिवास मोदी और माताजी विमला देवी मोदी हैं। हम दो भाई और एक बहन हैं। मैं सबसे बड़ा हूं, मेरे छोटे भाई सुमित मोदी हैं और सबसे छोटी बहन श्वेता मोदी हैं। मेरी बेटी सलोनी मोदी की पिछले साल शादी हुई है। बेटा राघव मोदी अभी बिजनेस की ट्रेनिंग ले रहा है। मेरे छोटे भाई सुमित की दो बेटियां हैं और बहन श्वेता की भी दो बेटियां हैं। कागजों और कामकाज की व्यवस्था में भले ही जिम्मेदारियां अलग-अलग हों, लेकिन व्यावहारिक रूप से हम आज भी एक परिवार की तरह जुड़े हुए हैं। हमारी कोशिश यही है कि अगली पीढ़ी को सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार
की सोच और सामाजिक जिम्मेदारी की विरासत भी मिले।
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समाजको किस तरह लौटा रहे है..? कोई खास तरीका.?
जवाब: मैं और परिवार इसका प्रचार-प्रसार नहीं चाहते। जहां जैसी जरूरत होती है, वहांउसकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए हम मदद करने का प्रयास करते हैं। हमारी सोच बहुत साफ है, अगर कोई बच्चा वास्तव में पढ़ना चाहता है तो आर्थिक कमजोरी उसके रास्ते में बाधा नहीं बननी चाहिए।
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मोदी ग्रुप भविष्य में किस मुकाम तक पहुंचना चाहता हैं..
जवाब : हमारा मिशन ही सेवा करना है। किसी अन्य मंजिल तक पहुंचना लक्ष्य नहीं है। भविष्य का स्पष्ट विजन यही है कि जो शिक्षा हम दे रहे हैं, उसकी गुणवत्ता बनी रहे और उसमें लगातार सुधार हो। इसी दिशा में जरूरत और समय की मांग के अनुसार आगे नए कदम उठाए जाएंगे।
